दंपत्ति की हत्या करने वाले जीजा-साले को हुई आजीवन कारावास की सजा, जाने पूरी खबर...
महासमुंद। अपने ही रिश्तेदार दंपत्ति की हत्या करने का दोषसिद्ध पाए जाने पर सत्र न्यायाधीश सुषमा सावंत ने जीजा-साले को उम्रकैद की सजा सुनाई है। वहीं साक्ष्य मिटाने के लिए तीन वर्ष के सश्रम कारावास और अर्थदंड से दंडित किया। अभियुक्त अशोक यादव, मृतक दंपत्ति का भतीजा है तथा दूसरा नारायण राउत, अशोक यादव का साला है। हत्या का कारण झाड़-फूंक बताया गया है। अभियोजन पक्ष के अुनसार लालाराम तथा उनकी पत्नी लीलाबाई ग्राम सुअरमाल के रहने वाले थे। उनका खेत ग्राम बाम्हनसरा खार में था। दोनों खेत में मकान बनाकर खेती-किसानी करने के लिए रहते थे। पुत्र हसलेख व मुकेश एवं पुरुषोत्तम ग्राम सुअरमाल में अपने पुराने घर में रहते हैं। तथा वहां से करीब तीन-चार किमी दूर उक्त खार में जाकर खेती करते थे। 15 अगस्त 2017 को हसलेख व पुरुषोत्तम उक्त खेत से घर लौट आये थे। दूसरे दिन 16 अगस्त 2017 को पुरुषोत्तम अपनी पत्नी कुमारी बाई के साथ सुबह सात बजे उक्त खेत में गया था। उन्होंने देखा कि खार में बना घर पूरी तरह से जल गया था और पिता लालाराम तथा माता लीलाबाई की भी जलकर मौत हो चुकी थी। हसलेख ने धनीराम यादव व लतीफ खान के साथ जाकर कोमाखान थाने में सूचना दी। जिस पर दो मर्ग प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू की गई। विवेचना में हत्या किये जाने के तथ्य सामने आने पर पुलिस ने अज्ञात के विरुद्ध भादवि की धारा 302 के तहत हत्या तथा 201 के तहत साक्ष्य मिटाने का अपराध 15 अक्टूबर 2017 को दर्ज किया और अभियुक्त नारायण पिता राधेश्याम राउत 27 वर्ष निवासी- मोटा नयापारा, थाना-धरम बांधा, जिला-नुआपाड़ा (ओडि़शा) तथा अशोक पिता पुनीत राम यादव 27 वर्ष निवासी ग्राम-भटगांव, थाना- कोमाखान, जिला-महासमुंद को अभिरक्षा में लेकर पूछताछ की। बाद में प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किया। अभियोजन ने प्रमाणित किया कि अभियुक्तगण घटना के पूर्व झाड़-फूंक के नाम पर मृतक लालाराम से सतत संपर्क में थे। घटना के समय वे घटना स्थल के आसपास मौजूद थे। और अपनी उपस्थिति छिपाने के लिये उन्होंने नुआपाड़ा जाकर अभियुक्त अशोक की पत्नी को अस्पताल में बिना किसी बीमारी के भर्ती करने का असफल प्रयास किया और अपने चाचा-चाची (मृतकों) के किसी भी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुये। परिस्थितियां इंगित करती हैं कि दोनों ने मृतक के साथ झगड़ा कर मारपीट की। जिसमें लालाराम की मौत हो गई, तथा बीच-बचाव कर रही लीलाबाई भी घायल हो गई, तब उन्होंने साक्ष्य मिटाने के लिये लालाराम के मृत और लीलाबाई के जीवित शरीर को धान के पैरा में ढंककर आग लगा दी। न्यायालय ने लालाराम की हत्या के लिये दोनों को उम्रकैद तथा लीलाबाई की हत्या के लिये भी दोनों को उम्रकैद और साक्ष्य मिटाने के अपराध के लिये दोनों को तीन वर्ष के सश्रम कैद की सजा सुनाई।







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