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एक गांव ऐसा, जहां मशाल जलाकर होती है बेटियों की शादियां

 एक गांव ऐसा, जहां मशाल जलाकर होती है बेटियों की शादियां
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सीधी। सरकार भले ही प्रदेश के कोने-कोने में बिजली पहुंचाने का दावा करती है, लेकिन आज भी ऐसे कई गांव हैं, जहां बिजली की पहुंच नहीं हो सकी है। आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी ग्रामीण अंधेरे में जिंदगी जीने को मजबूर हैं। ऐसा ही एक गांव है सीधी जिले के आदिवासी बाहुल्य जनपद पंचायत कुसमी का ताल गांव। इस गांव में लोग अंधेरे को अपना भाग्य मान चुके हैं।
 
 
हालाते ये हैं कि यहां बेटियों की शादियां मशाल की रोशनी में होती है। ये गांव प्रदेश सहित जिले के अंतिम छोर पर बसा है। इस गांव को छूकर बहने वाली मबई नदी प्रदेश की सीमा तय करती है। ग्रामीणों के मुताबिक साल 2014 में ग्रामीणों के प्रदर्शन के बाद सोलर पैनल से गांव को रोशन करने का काम शुरू हुआ। वर्ष 2015 में गांव में सौर ऊर्जा से बनी बिजली पहुंची, लेकिन ये रोशनी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी। सोलर प्लांट में लगाई गई 18 सोलर प्लेट्स चोरी हे गई।
 
 
इसकी सूचना ग्रामीणों ने पोंडी पुलिस चौकी में दी, पर पुलिस महज दो प्लेट ही बरामद कर सकी। सोलर प्लांट बेकार हो गया। महिलाओं ने बताया कि गांव की लड़कियों की शादी अंधेरे में होती है। इस गांव में जनरेटर मंगाना महंगा पड़ता है, क्योंकि जनरेटर के किराएसे ज्यादा उसे लाने ले जाने का खर्चा होता है। ऐसे में लालटेन और चिमनी की रोशनी में ही रात गुजरती है। बेटों की शादी में उपहार के रूप मं बिजली से चलने वाले उपकरण नहीं लिए जाते। बेटियों की शादी में मशाल जलाई जाती है, जिससे रस्में पूरी की जा सके।
 
 
ताल और इससे सटे छड़ाहुला गांव के आदिवासी किसान सालभर मं एक फसल ही लेते हैं, वो भी खरीफ सीजन में। बिजली नहीं होने से पानी की व्यवस्था करना मुश्किल है। ग्रामीण बेन बहादुर सिंह ने बताया कि गांव का किसान चाहकर भी रबी सीजन की फसलों में सिंचाई नहीं कर पाते। ये स्थिति तब है जब गांव के पास से मबई नदी निकलती है। डीजल पम्प महंगा पड़ता है।

 


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