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Article 370 : कश्मीरी भाषाओं के जीवंत होने की उम्मीद, सांस्कृतिक पहचान मजबूत करने का मौका

Article 370 : कश्मीरी भाषाओं के जीवंत होने की उम्मीद, सांस्कृतिक पहचान मजबूत करने का मौका
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मैं एक डोगरा ब्राह्मण हूं, वतन से दूर रहने वाला और जड़ों से बिल्कुल कटा। मातृभाषा है डोगरी। पर मैंने क्या, मेरे पिता ने भी डोगरी या कश्मीरी कभी नहीं बोली। पुरखों की मातृभाषा से वास्ता पड़ा तो प्रवासियों के सालाना मिलन समारोहों में या रिश्तेदारों के घर जम्मू जाने पर। जब तक जम्मू-कश्मीर से अपने गहरे रिश्तों का भान होता, गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका था। अखबार की नौकरी बनारस से मुंबई खींच लाई, जहां डोगरी तो दूर, ढंग से मराठी भी नहीं सीख पाया हूं। महानगर में इस समुदाय से जो साबका पड़ा उससे अपने ही पुरखों की भाषा, रीति-रिवाज और संस्कार से परिचित न होने की कुंठा बढ़ती गई। महसूस किया कि तादाद में बहुत कम होने के बावजूद इन लोगों में अपनी जड़ों से जुड़ने की कामना कितनी प्रबल है। उन्हें हर जगह देखा-सिक्योरिटी एजेंसी और फौज में। आइटी, व्यापार और होटल बिजनेस में। सबसे ज्यादा तो फिल्म लाइन के साइड धंधों में। दिल्ली के बाद देश में सबसे ज्यादा डोगरे और कश्मीरी पंडित मुंबई में ही बसे हैं।

 

कुंठा के बाद जो पहली प्रतीति हुई वह गर्व की। देश की आर्थिक राजधानी में ऐसे बहुत कम समुदाय हैं, जिन्होंने दर-बदर और वतन से दूर होकर भी अपना अलग स्थान बनाने की जद्दोजहद नहीं छोड़ी है। डोगरे और कश्मीरी जहां भी हैं, अपनी मेहनत से नई जगह बनाते जा रहे हैं। अनुपम खेर तो खैर, सभी को मालूम हैं, पर मुंबई में ही ऐसे कितने ही लोगों को मैं जानता हूं। जैसे ऑफ बीट प्रोफेशन की दो लड़कियां-अफशान आशिक और कश्मीआ वाही। 25 वर्षीया अफशान-जिन्हें कश्मीर घाटी में ‘पुरुषों का खेल’ खेलने के लिए बैन कर दिया गया था-आज महिलाओं के फुटबॉल में धमाल मचा रही हैं। किशोरावस्था कश्मीआ, जिन्होंने मेनसा आइक्यू टेस्ट में सबसे ज्यादा स्कोर कर खुद को इंटेलिजेंट साबित कर दिया है। कश्मीरी पंडित समुदाय की उर्मिला जुत्शी से हुई मुलाकात याद आती है। कश्मीर घाटी में पंडितों के घर-बार और जमीन-जायदाद पर आतंकवादियों का नजला फूटा था, तो जुत्शी परिवार भी नहीं बच पाया था।

 

करीब 12 वर्ष पहले जब वापस लौटने की सारी उम्मीदें खत्म हो गईं, तो मजबूर होकर सब कुछ बेचकर उसे मुंबई को ही स्थायी ठौर बनाना पड़ा। 1989 के पलायन के बाद उनके बच्चों ने कश्मीर देखा तक नहीं है। अगर वे उन्हें अपनी परंपरा और संस्कृति के बारे में बताएंगे नहीं, तो उन्हें पता कैसे चलेगा कि कश्मीर है क्या? ‘यहूदियों का तो लंबे संघर्ष के बाद अपना एक ठिकाना भी है, पर हम तो दर-ब-दर ही भटक रहे हैं’, कश्मीरी पंडित एसोसिएशन के राजेन कौल कहते हैं, ‘अपनी भाषा और संस्कृति हमने बचाकर नहीं रखी तो यह खत्म हो जाएगी।’ इसीलिए 65 वर्षों से मुंबई के सारे डोगरे परिवार जनवरी-फरवरी के किसी सप्ताहांत में मिलकर 24 घंटों तक हवन और सामूहिक भोज का आयोजन करते आए हैं।


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