आलेख : सत्ता संसाधन और नागरिक... आदित्य दुबे
भारत जितनी विविधताओं से भरा देश है उतना ही अपने उद्घाटित विरोधाभासों से भी पोषित है। कहानी कुछ ऐसी है कि, संसाधन एक तरफ और दूसरी तरफ उसके दावेदार और उनकी दावेदारी के आधार... देश में आप एक तरफ एक ऐसे सांस्कृतिक समाज का दृश्य देखते हैं जो आपको पूरे विश्व में नहीं मिलता है वहीं दूसरी तरफ एक ऐसे समाज का दृश्य देखते हैं जो अपने आपको अन्यों से भिन्न महसूस करता है और यह भिन्नता के मानक न जाने कितने अर्थों में गढ़े गए हैं? न जाने कितने ऐसे मुद्दे है जो आपको साथ खड़ा करते है और न जाने कितने ऐसे मुद्दे है जो आपको एक दूसरे का शोषण का कारण मानने लगते है। बात समस्याओं से प्रारंभ होती है और एक नई समस्या का रूप ले लेती है लेकिन समाधान नहीं निकलता। समस्या का यह रूप विवाद को जन्म देते हैं और विवाद कब मुद्दों और अवसरों के तौर पर सत्ता का रास्ता आसान कर देती है हमें पता ही नहीं लगता। सत्ता अपने स्वार्थों पे काम करती है। ये सभी परिस्थितियों में आपको अनुभव होता है। इन सबके केन्द्र में मौजूद है संसाधन और उसके दावेदार नागरिक। जी हां, जिस संसाधनों को पाने की होड़ मची है और उसके लिए कितने दावेदारी पेश किए गए हैं क्या कभी किसी वर्ग को इसका संतोष प्राप्त हो पाया है? नहीं। क्योंकि ये सत्ता का आधार है जो उसे अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ताक़त देती है। देश का नागरिक समाज आपस में ही संघर्ष/द्वंद्व कर रहा होता है। ये संघर्ष इतने कड़वाहट ला देतें है कि, आप स्वयं को किसी भी स्थिति में नहीं रख पाते हैं। कई ऐसे प्रतिबिंब निर्मित हो जाते है जो आपको एक-दूसरे से अलग स्थापित कर जाते है।
इतिहास की व्याख्याएं अलग-अलग तरीकों से होने लगती है, पर वास्तव में उन बातों का लोप/विघटन दिखता है, जहां से देश में संसाधनों की लूट हुई। एक सुनियोजित तरीके से एक ऐसी संरचनाएँ बनाई गई, जिसने एक तरफ़ सोने की चिड़िया कहलाने वाले भारत को हद तक लूटा, वहीं दूसरी तरफ इस लूट से तबाह भारतीय अपने ही जड़ें कांटता रहे। जिन वैदिक धर्म ग्रन्थों पर आज प्रश्न किया जा रहा है, वहीं भारत की सांस्कृतिक एकता के आधार रहे हैं। विदेशी आक्रांताएं यहां संसाधन तो लूट रहीं थी साथ ही साथ भारत की सांस्कृतिक एकता को तोड़ने के भी प्रयास उनके द्वारा किए गए। जैसे प्राचीन स्थापत्यों को नष्ट करना, विश्वविद्यालयों और पुस्तकालयों को जलाना, धर्म परिवर्तन, विरोधों का दमन, जातिवाद और उससे आगे नस्लवाद, ऐसे कई उदाहरण आपको मिलेगें जो भारत की संस्कृति में नहीं थी। ये सभी समस्या 'पश्चिम' की रही है।
इन सभी में महत्वपूर्ण रही आधुनिक शिक्षा के नाम पर भारतीय शिक्षा पद्धति को ख़त्म करना। विदेशी आर्थिक लूट ने सम्पन्न देश को तबाह तो किया ही और दूसरी ओर झूठी कहानियों और अफ़वाहों से एक ऐसे वातावरण को तैयार किया जिससे भारतीय इसके लिए अपनों को ही दोषी ठहराते रहे। इसको आसान बनाया आंग्ल भाषा और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ने। ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों के द्वारा वैदिक ग्रन्थों की अपने अनुसार गलत अनुवाद और समीक्षा की गई, जिनको संस्कृत भाषा का जरा भी ज्ञान न था और इसका दूसरा पक्ष भारतीयों को भाषा, धर्म, जाति और असमानता के रूप में अपराध बोध कराता रहा। पूरे विश्व में हम आज तक इस आर्थिक लूट की जवाबदेही तो दूर इसके लिए एक स्वस्थ विचार भी नहीं रख पाए और उल्टे आपस में ही संघर्ष करते रहे है। क्योंकि हमारी पूरी मानसिकता इस विचार पर आ टिकी है कि, हमारी इस परिस्थिति के जिम्मेवार हमारे अपने देश के लोग ही है। इसी सोच से यह समस्या प्रारम्भ होती है और सत्ता अपना रास्ता तैयार करती जाती है।
कहने-लिखने को बहुत से तथ्य है जो इन बातों को प्रामाणिकता से स्पष्ट करते आएं हैं। वर्तमान में इस पर तर्कसंगत विचार और समाधान हो तो भविष्य में सत्ता, संसाधन और नागरिकों में अपेक्षित संतुलन सम्भव हो पाए।







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