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छत्तीसगढ़ का एक गांव ऐसा जहां देवियों के आदेश पर नहीं मनाई जाती होली, रंग खेलने से देवी हो जाती है नाराज

छत्तीसगढ़ का एक गांव ऐसा जहां देवियों के आदेश पर नहीं मनाई जाती होली, रंग खेलने से देवी हो जाती है नाराज
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छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में एक ऐसा गांव है, जहां पिछले 100 सालों से ग्रामीण न तो होलिका दहन करते हैं और न ही रंग गुलाल खेलते हैं। त्योहार में यहां की दिनचर्या सामान्य दिनों की तरह होती है। ग्रामीण त्योहार के दिन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर परिवार व गांव की सुख-शांति, समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि देवियों का आदेश है, इसलिए होली नहीं मनाते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
जिले के मैनपुर तहसील मुख्यालय से लगभग 80 किमी दूर ग्राम पंचायत खजुरपदर की जनसंख्या लगभग 2 हजार के आसपास है। ग्रामीणों के अनुसार पिछले 100 सालों से गांव में होली का त्योहार नहीं मनाया गया होगा। होली का त्योहार न मनाने का कारण ग्रामीण देवीय प्रकोप बताते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि होली का त्योहार मनाए जाने से गांव की देवी नाराज हो जाती है और देवी का प्रकोप बढ़ जाता है। गांव में प्रमुख देवी के रूप में ग्राम श्रीमाटी देवता और शानपाठ देवी की पूजा होती है। दोनों देवियों के आदेशानुसार ही गांव में होली नहीं मनाते हैं। होली के दिन खजुरपदर गांव के लोग अपने घरों में ही रहते हैं और देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं।
देवी प्रकोप हुआ था, तब से नहीं खेलते होली
खजुरपदर के जनपद सदस्य जयसिंह नागेश, सरपंच कुमारी बाई नागेश ने बताया कि बुजुर्गों ने वर्षों पहले बताया है कि गांव में होली खेलने से देवी नाराज हो गई थी। देवी को रंग गुलाल पसंद नहीं है। होली खेलने के बाद गांव में प्रकोप बढ़ गया था। होली के बाद बड़ी माता के रूप में चेचक और उल्टी दस्त से ग्रामीण ग्रसित हो गए थे। ऐसी स्थिति में पूर्वजों ने देवीमाता को माफी मांगी, मान मनौव्वल किया, पूजा अर्चना की, तब कहीं जाकर गांव की स्थिति सुधरी थी। तब से लेकर आज तक कभी होली नही खेली गई।
गांव में बाहरी लोग भी नहीं खेलते रंग-गुलाल
गांव के पटेल व पूर्व सरपंच येपेश्वर नागेश ने बताया कि खजुरपदर गांव में होली न खेले जाने की परंपरा को आसपास के पूरे गांव के लोग भी जानते हैं। होली के दिन यदि कोई दूसरे गांव का व्यक्ति भी खजुरपदर गांव पहुंच जाता है, तो वह ग्रामीणों को रंग लगाने की कोशिश नहीं करता। वह इस दिन सीधे रास्ते से निकल जाता है। गांव के युवा भी इस परंपरा को बराबर से मानते आ रहे हैं। ग्रामीण धरम सिंह, पूरन प्रताप ने बताया कि हमें हर हाल में गांव की खुशहाली चाहिए। यदि हमारे गांव की देवी चाहती है कि गांव में होली न खेला जाए तो वहीं हमारे लिए अच्छा है।

 



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