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बड़ी खबर : छत्तीसगढ़ महालेखाकार कार्यालय ने वित्तीय वर्ष 2018 की जारी की रिपोर्ट, जाने क्या है स्थिति

बड़ी खबर : छत्तीसगढ़ महालेखाकार कार्यालय ने वित्तीय वर्ष 2018 की जारी की रिपोर्ट, जाने क्या है स्थिति
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रायपुर | छत्तीसगढ़ के महालेखाकार कार्यालय ने आज सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में सीएजी ने बताया 31 मार्च 2018 को, छत्तीसगढ़ में 26 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम थे, जिनमें एक सांविधिक निगम और 25 सरकारी कंपनियां, जिनमें तीन गैर कार्यरत सरकारी कम्पनियाँ भी शामिल हैं। जो भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के लेखापरीक्षा क्षेत्राधिकार के अधीन आती थी। इस प्रतिवेदन में 18 सार्वजनिक उपक्रमों को जिनके लेखे तीन वर्ष या अधिक समय से बकाया नहीं है अथवा कार्यरत थे/परिसमापन के अधीन नहीं थी, शामिल किया गया है। इस प्रतिवेदन में शामिल कार्यरत उपक्रमों ने अपने अद्यतन अंतिमीकृत लेखों के अनुसार 28 हजार 802.99 करोड़ का वार्षिक टर्नओवर दर्ज किया। यह टर्न ओवर छत्तीसगढ़ के कुल सकल घरेलु उत्पाद के 9.87 प्रतिशत के बराबर था। आठ उपक्रम जिनका निवेश 394.63 करोड़ है, इस प्रतिवेदन में शामिल नहीं है।

 

छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत बोर्ड ने व्यवहार्यता प्रतिवेदन के आधार पर राज्य के जांजगीर-चाम्पा जिले के मड़वा ग्राम में कोयला आधारित 2X500 मेगावाट की ग्रीन फील्ड विद्युत परियोजना की स्थापना के प्रस्ताव को अनुमोदित किया। व्यवहार्यता प्रतिवेदन के अनुसार वर्ष 2005-06 के दौरान 15,146.04 मिलियन यूनिट की मांग के विरुद्ध 11,011.32 मिलियन यूनिट की उपलब्धता थी जो कि वर्ष 2011-12 के दौरान बढ़कर 31,527.24 मिलियन यूनिट के विरुद्ध 33,945 मिलियन यूनिट होगी।


विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन के अनुसार परियोजना की लागत 5,119.84 करोड़ थी जो कि 30 नवम्बर 2012 को पूर्ण की जानी थी। जो कि तीन वर्ष आठ माह के अधिक समय तथा 31 मार्च 2019 तक 3,772.67 करोड़ की अधिक लागत के साथ 31 जुलाई 2016 को पूर्ण किया गया। बाद में सितम्बर 2018 में परियोजना का नाम बदलकर, ‘‘अटल बिहारी वाजपेयी तापीय विद्युत गृह रखा गया।


डीपीआर तैयार करने के लिए सलाहकार के कार्य क्षेत्र के अनुसार, सलाहकार की ओर से मानचित्रों का डेस्क-टाॅप अध्ययन किया जाना था। डीपीआर के अनुरूप 80 प्रतिशत भूमि बंजर व 20 प्रतिशत कृषि भूमि थी। जिसके लिए विस्तृत सर्वेक्षण नहीं किया गया था। कम्पनी ने कुल 1,728.73 एकड़ भूमि अधिग्रहित की, जिसमें से सिर्फ 283.77 एकड़ भूमि बंजर थी तथा शेष 1,444.96 एकड़ 31 मार्च 2018 को समाप्त वर्ष के लिए सार्व जनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर लेखापरीक्षा प्रतिवेदन कृषि भूमि थी। परिणामतः पुनर्वास व पुनर्स्थापना के 15 प्रकरण, भू-विस्थापितों का विरोध, हड़ताल, कामरोको, तालाबंदी जैसी घटनायें हुई, जिससे परियोजना के कार्य में रुकावटें आई।


यह भी देखा गया कि कम्पनी ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्त न मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पर्यावरण स्वीकृति प्रदान करते समय निर्धारित सीमा 1,254.76 एकड़ के विरूद्ध कुल 1,728.73 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया। जो निर्धारित सीमा से 38 प्रतिशत अधिक थी जिसके लिए एमओईएफ एण्ड सीसी से कोई भी स्वीकृति प्राप्त नहीं की गयी तथा जिसके कारण भी अभिलेखों में उपलब्ध नहीं थे। अधिक भूमि के अधिग्रहण के परिणामस्वरूप परियोजना की लागत में 63.32 करोड़ की वृद्धि हुई।


अनुशंषाओं का सारांश कम्पनी को चाहिए -
भूमि के अधिग्रहण के लिए कार्यवाही से पहले हमेशा भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण तथा आवश्यकता का निर्धारण करें तथा उन जिम्मेदार अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही करे जो भूमि की प्राकृत का निर्धारण करने में असफल रहे। वह अपनी भविष्य की परियोजनाओं में अग्रिम जारी करने के सम्बन्ध में अनुबंध के नियमों व शर्तों का निर्धारण करते समय अपने वित्तीय हित की रक्षा करें।


समय और लागत वृद्वि और जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन हानि को रोकने के लिए कम्पनी को बेहतर योजना, सटीक निगरानी और ठेकेदार और सलाहकारों के साथ उत्कृष्ट तालमेल द्वारा समयबद्ध रूप से तापीय विद्युत संयंत्र का क्रियान्वयन सुनिश्चित करें।
परिचालनात्मक निष्पादन में सुधार करने का प्रयास करें और उत्पादन लागत को कम करने के लिए कोयले और ऑयल की खपत के संबंध में सीएसईआरसी द्वारा निर्धारित परिचालन मानदंडों को प्राप्त करें। पर्यावरण अधिनियमों और विनियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें। एसएपी-ईआरपी प्रणाली के माध्यम से पूर्व क्रियान्वयन गतिविधियों, परियोजना के क्रियान्वयन, नियमों और शर्तों का अनुपालन से संबंधित अपने आंतरिक नियंत्रण और निगरानी तंत्र को मजबूत करें।



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