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राममय है छत्तीसगढ़ के लोगों की जीवन शैली: राज्यपाल सुश्री अनुसूइया उइके

 राममय है छत्तीसगढ़ के लोगों की जीवन शैली: राज्यपाल सुश्री अनुसूइया उइके
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रायपुर। राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके ने कहा है कि छत्तीसगढ़ के कण-कण में भगवान श्रीराम रचे -बसे हैं। यहां के लोगों की जीवन शैली पूरी तरह से राममय हैं। उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन दर्शन का अमिट प्रभाव है।

राज्यपाल सुश्री  उइके ने बीती शाम यहाँ ''दक्षिण कोसल में राम कथा की व्याप्ति एवं प्रभाव" विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय वेबशोध संगोष्ठी के समापन सत्र में मुख्य अतिथि की आसंदी से इस आशय के विचार व्यक्त किए। 

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल  के नाम से भी जाना जाता है। यह वह पुण्य भूमि है, जिसे भगवान श्रीराम का सान्निध्य मिला और यहाँ अनेक पुण्य आत्माओं का भी जन्म हुआ है । छत्तीसगढ़ को अनेक ऋषि-मुनियों का आशीर्वाद प्राप्त है।  

यह संगोष्ठी गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर, अयोध्या शोध संस्थान,उत्तरप्रदेश शासन तथा सेंटर फॉर स्टडीज ऑन होलिस्टिक डेवलपमेन्ट रायपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। ग्लोबल इनसायक्लोपीडिया ऑफ़ रामायण के संयोजक ललित शर्मा ने समापन कार्यक्रम का संचालन किया। वेब शोध संगोष्ठी में राज्यपाल सुश्री उइके ने कहा कि मुझे बताया गया है कि यह संगोष्ठी ग्लोबल इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रामायण तैयार करने की दृष्टि से आयोजित की जा रही है। यह विषय संपूर्ण भारतवासियों ही नहीं पूरे विश्व में हमारी भारतीय संस्कृति के जो उपासक हैं, उन सभी के लिए महत्वपूर्ण है। 

कार्यक्रम में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर की कुलपति डॉ. अंजिला गुप्ता, अयोध्या शोध संस्थान, उत्तर प्रदेश शासन के निदेशक डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह, ग्लोबल इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रामायण, छत्तीसगढ़ के संयोजक एवं सम्पादक इण्डोलॉजिस्ट श्री ललित शर्मा, फार्मेसी कौंसिल ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष प्रो. शैलेन्द्र सराफ, सीएसएचडी छत्तीसगढ़ के सचिव श्री विवेक सक्सेना तथा संगोष्ठी संयोजक प्रो प्रवीण मिश्र बिलासपुर आयोजन सचिव डॉ नीतेश मिश्रा भी शामिल हुए।

राज्यपाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ की भूमि और यहां के लोगों में भगवान श्रीराम का इतना प्रभाव है कि उनकी सुबह राम -नाम के अभिवादन से होती है और जब वे किसी से मिलते हैं तो वे एक दूसरे से राम-राम कहकर अभिवादन करते हैं। उनके नाम में भगवान श्रीराम का उल्लेख मिलता है। हम यदि गांव में जाएं तो वहां के लोग रामचरित मानस का पाठ करते मिलते हैं और पुण्य लाभ लेते हैं। छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में रामायण मण्डलियां होती है,जिनके  बीच रामचरितमानस गायन की प्रतियोगिताएं  भी होती है। अभी भी कई स्थानों पर रामलीला का मंचन होता है। दशहरे के समय तो यहां की रौनक देखते ही बनती है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का संपूर्ण जीवन प्रेरणादायी है। उनके जीवन से हमें समन्वयवादी जीवन शैली अपनाने की प्रेरणा मिलती है। हम छत्तीसगढ़ को देखें तो यहां भी समन्वयवादी संस्कृति मिलती है। यह सब भगवान श्रीराम के आशीर्वाद से ही संभव हो पाया है। छत्तीसगढ़वासियों के मन में भगवान श्री राम के प्रति अथाह प्रेम है। यहां एक समुदाय ऐसा भी है, जिसके सदस्य अपने पूरे शरीर में भगवान श्रीराम के नाम का गोदना गोदवा लेते हैं, भगवान श्री राम के प्रति ऐसा समर्पण शायद ही कहीं देखने को मिले। इसे रामनामी सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है।

राज्यपाल ने  कहा कि हम छत्तीसगढ़ में भगवान श्री राम के प्रति प्रेम भाव की बात करें तो कवर्धा जिले में एक पंचमूखी बुढ़ा महादेव मंदिर का उल्लेख किया जाना चाहिए, जहां पर अनवरत रामधुन गाई जाती है। यही नहीं इस प्रदेश में भगवान श्रीराम इतने गहराई तक समाए हुए हैं कि यहाँ मुस्लिम समुदाय के दाउद खान जैसे लोकप्रिय रामायणी  हुए, जिनमें राम के प्रति इतनी आस्था थी कि वह आजीवन रामकथा का वाचन करते रहे और उन्हें पूरी रामकथा कंठस्थ थी।

सुश्री उइके ने कहा कि छत्तीसगढ़ को भगवान राम का ननिहाल माना जाता है। यह माना जाता है कि रायपुर जिले के चन्द्रखुरी नामक गांव में माता कौशल्या का जन्म हुआ था, इसका प्रमाण है कि वहां माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर स्थापित है। इस नाते भगवान राम को पूरे छत्तीसगढ़ का भांजा माना जाता है। इसलिए भांजे को श्रेष्ठ स्थान देने की परम्परा है और उनके पैर भी छुए जाते हैं।
 
 राज्यपाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ को दण्डकारण्य भी कहा जाता है, जहां वनवास के दौरान भगवान राम अधिकतम समय व्यतीत किया था, जिस दक्षिण पथ मार्ग से वे लंका विजय के लिए गये उसे हम राम वन गमन पथ के नाम से जानते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य शासन द्वारा इसे विकसित करने की योजना बनाई गई है। मुख्य वक्ता रेखा पाण्डेय ने कहा कि रामायण काल में दक्षिण कोसल एक ऐसा स्थान माना जाता है, जहां भगवान श्रीराम ने माता सीता एवं भ्राता लक्ष्मण के साथ वनवास का सर्वाधिक समय व्यतीत किया। यह भूमि श्रीराम की लीला भूमि के साथ ऋषि-मुनियों की प्रमुख केन्द्र रही है। संगोष्ठी के समापन सत्र में सेंटर फॉर स्टडीज ऑन होलिस्टिक डेवलपमेन्ट छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष श्री बी. के. स्थापक ने कहा कि भगवान श्री राम हम सबके आस्था के केन्द्र हैं। छत्तीगढ़ को दक्षिण कोसल कहा जाता है, जिसका भगवान श्रीराम का करीब का संबंध रहा है। यहां माता कौशिल्या की जन्मभूमि है, जहां पर माता कौशिल्या के मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। 


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