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पुरी में देवस्नान पूर्णिमा आज,’सोने के कुएं’ के जल से स्‍नान करेंगे प्रभु जगन्‍नाथ, फिर 15 दिन रहेंगे बीमार

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 हिंदू धर्म में जगन्नाथ रथ यात्रा  बहुत विशेष मानी जाती है। यह त्योहार भगवान कृष्ण के साथ-साथ भाई बलभद्र और उनकी छोटी बहन सुभद्रा की पूजा के लिए समर्पित है। यह दिव्य उत्सव पूर्णिमा से शुरू होता है। इस उत्सव के दौरान मुख्य रूप से तीन रथ आकर्षण के केंद्र होते हैं। सदियों पुरानी यह परंपरा सभी भक्तों के लिए खास है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रथ को खींचने से भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को अपार सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं और उनकी सभी बाधाओं का नाश करते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि इसमें शामिल होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सालभर आईना रखकर प्रभु की छवि को स्नान कराने की परंपरा
सालभर भगवान को गर्भगृह में ही स्नान कराते हैं, लेकिन प्रक्रिया अलग है। इसमें मूर्ति के सामने बड़े आईने रखते हैं, फिर आईनों पर दिख रही भगवान की छवि पर धीरे-धीरे जल डाला जाता है। लेकिन, देवस्नान पूर्णिमा के लिए मंदिर प्रांगण में मंच तैयार होता है।तीन बड़ी चौकियों पर भगवानों को विराजित करते हैं। भगवान पर कई तरह के सूती वस्त्र लपेटते हैं, ताकि उनकी काष्ठ काया पानी से बची रहे। फिर महाप्रभु को 35, बलभद्र जी को 33, सुभद्राजी को 22 मटकी जल से नहलाते हैं। शेष 18 मटकी सुदर्शन जी पर चढ़ाई जाती हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा की शुभ तिथि और मुहूर्त क्या है?

जगन्नाथ रथ यात्रा 07 जुलाई को सुबह 08 बजकर 05 मिनट से से लेकर सुबह 09 बजकर 27 मिनट तक निकाली जाएगी। उसके बाद दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से लेकर 01 बजकर 37 मिनट तक निकाली जाएगी। उसके बाद फिर शाम 04 बजकर 39 मिनट से लेकर 06 बजकर 01 मिनट तक निकाली जाएगी।

जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत भगवान कृष्ण के समय से मानी जाती है

पौराणिक कथा के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत भगवान कृष्ण के समय से मानी जाती है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा और बलराम जी को रथ पर बिठाकर रथ यात्रा निकाली थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। वहीं रथ यात्रा का उल्लेख 12वीं शताब्दी के साहित्य में मिलता है। 15वीं शताब्दी में, राजा कपिल देव ने जगन्नाथ मंदिर का निर्माण करवाया और रथ यात्रा को और भी भव्य बनाया। 18वीं शताब्दी में, रथ यात्रा को अंग्रेजों ने भी संरक्षण दिया। आज, जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। यह हर साल लाखों लोगों को आकर्षित करता है।

  • बलराम जी का रथ (तालध्वज) – यह रथ सबसे पहले निकलता है। इसका रंग लाल और हरा होता है।
  • देवी सुभद्रा का रथ (दर्पदलन या पद्म रथ) – यह रथ बीच में निकलता है। इसका रंग काला या नीला और लाल होता है।
  • भगवान जगन्नाथ का रथ (नंदीघोष या गरुड़ध्वज) – यह रथ सबसे पीछे निकलता है। इसका रंग लाल और पीला होता है।
 

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