पितरों के स्मृति का पर्व पितृपक्ष आज से प्रारंभ
रायपुर। प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी आश्विन मास की प्रथम तिथि से पूर्वजों को स्मरण करने का पर्व पितृपक्ष श्राद्ध आज से प्रारंभ हो गया है। राजधानी रायपुर सहित पूरे प्रदेश भर में हिंदू परिवारों के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा तालाब, नदी आदि पहुंचकर विधिवत पूजन के साथ जल एवं कुश लेकर प्रथम तर्पण किया गया। पौराणिक मान्यता के अनुसार हिंदू परिवारों में पितृपक्ष में 15 दिन पूर्वज पृथ्वी लोक में पहुंचकर अपने परिजनों से अप्रत्यक्ष रूप से मिलते है इस दौरान वंशज अधिक से अधिक आशीर्वाद पाने के लिए पितरों के पसंद का भोज एवं तिथि अनुसार सगे संबंधियों को अपने आवास में बुलाकर सामूहिक रूप से पितरों का स्मरण करते हैं। पितरों के आशीर्वाद से वंशजों के बिगड़े काम बनते हैं हर शुभ कार्य में पितृपक्ष में किया गया कृत्य परिवार में अक्षय सुखों की वर्षा करता है। आज सुबह से ही खारून नदी एवं शहर के तालाबों में पहुंचकर लोगों ने अपने पितरों के स्मरण विधिवत पिंडदान किया।
मान्यता के अनुसार पितरों का आशीर्वाद सूक्ष्मलोक से परिवार जनों को मिलता रहता है। पितृपक्ष में पितृ धरती पर आकर लोगों को आशीर्वाद देते हैं और उनकी समस्याएं दूर करते हैं. इस बार पितृपक्ष 02 सितम्बर से 17 सितंबर तक रहेगा। पहला पितृपक्ष श्राद्ध आज पहला पितृपक्ष श्राद्ध आज से शुरू
विधिवत पितृ तर्पण कैसे किया जाता है इस वणर््ान शास्त्रानुसार यह है कि पितरों को हल्की सुगंध वाले सफेद पुष्प अर्पित करें परिवार के जिन पूर्वजों का देहांत हो चुका है, उन्हें पितृ कहा जाता है. जब तक कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद पुनर्जन्म नहीं ले लेता, तब तक वह सूक्ष्मलोक में रहता है. ऐसा मानते हैं कि इन पितरों का आशीर्वाद सूक्ष्मलोक से परिवार जनों को मिलता रहता है|
पितृपक्ष में कैसे करें पितरों को याद?
पितृपक्ष में हम अपने पितरों को नियमित रूप से जल अर्पित करें. यह जल दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके दोपहर के समय दिया जाता है. जल में काला तिल मिलाया जाता है और हाथ में कुश रखा जाता है. जिस दिन पूर्वज की देहांत की तिथि होती है, उस दिन अन्न और वस्त्र का दान किया जाता है. उसी दिन किसी निर्धन को भोजन भी कराया जाता है. इसके बाद पितृपक्ष के कार्य समाप्त हो जाते हैं|
कौन पितरों के लिए श्राद्ध कर सकता है?
घर का वरिष्ठ पुरुष सदस्य नित्य तर्पण कर सकता है. उसके अभाव में घर को कोई भी पुरुष सदस्य कर सकता है. पौत्र और नाती को भी तर्पण और श्राद्ध का अधिकार होता है. वर्तमान में स्त्रियां भी तर्पण और श्राद्ध कर सकती हैं. इस अवधि में दोनों वेला स्नान करके पितरों को याद करना चाहिए. कुतप वेला में पितरों को तर्पण दें. इसी वेला में तर्पण का विशेष महत्व है। पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर ही किया जाना चाहिए. श्राद्ध को लेकर कुछ विशेष मान्यताएं भी बताई गईं हैं. जैसे पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी के दिन ही किया जाता है. अगर के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई है तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है. साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाना चाहिए. जिन पितरों की मृत्यु तिथि याद नहीं हो, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाना चाहिए|
पिंड दान की विधि-
श्राद्ध में पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज कराया जाता है. इसमें चावल, गाय का दूध, घी, शक्कर और शहद को मिलाकर बने पिंडों को पितरों को अर्पित किया जाता है. जल में काले तिल, जौ, कुशा यानि हरी घास और सफेद फूल मिलाकर उससे विधिपूर्वक तर्पण किया जाता है. इसके बाद ब्राह्मण भोज कराया जाता है. कहा जाता है कि इन दिनों में आपके पूर्वज किसी भी रूप में आपके द्वार पर आ सकते हैं इसलिए घर आए किसी भी व्यक्ति का निरादर नहीं करना चाहिए।







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