आलेख: मुफ्तखोर जनता और कल्याणकारी राज्य - आदित्य दुबे
मुफ्तखोर जनता और कल्याणकारी राज्य (welfare state)
मुफ्तखोर..!! कौन नहीं है?
या
कौन नहीं होना चाहता??
बिजली, पानी, सड़क, पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा,गरीबी, बेरोजगारी, भत्ता, सब्सिडी इत्यादि ये सब तो आम जनता के ख़ास मुद्दे है, जिन पर नेता, अफ़सर, कारपोरेट और दलालों के कब्जे है, इनके हिस्सों के बाद अगर कुछ बचता है तो आम आदमी को मिलने वाली ये उपलब्धि बहुत ख़ास हो जाया करती है।
उन सुविधाओं को मुफ्त में लेने की बात करना कहां तक उचित होता है, जिसका मूल्य हम अपने ही घर उजाड़ कर चुका रहे हो, फिर वो पहाड़ें खोदकर लोहा-कोयला और हीरा निकालने की बात हो या फिर बांधों से बिजली बनाने की बात हो या फिर जमीनों से शहर बसाने की बात हो।
देश के तमाम संसाधनों का इस्तेमाल हम बड़ी तेज़ी से कर रहे हैं, लेकिन आम जनता के बीच इसका लाभ उस अनुपात में पहुंच पा-रहा है?
भारतीय संविधान में सरकारों को वेलफेयर स्टेट के तौर पर रखा गया, जहां सरकार का कार्य आम जनता के कल्याण और उनके हित में कार्य करना मात्र है। अब तक सरकारें इस कसौटी पर कहां तक खरी उतरी है? ये भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।
सत्ता का अर्थशास्त्र शायद इन सब बातों से परे होकर अपने सिद्धांतों पर काम करता है। ये मुद्दे केवल अवसर के विकल्प बन जाते हैं और संसाधन और जनता उसके केंद्र हो जाते है।
...लेकिन लोकतंत्र जैसे-जैसे परिपक्व होता जाता है, वैसे-वैसे ही विकल्प और केंद्र के साथ परिणाम भी बदलते जाते है..।







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