पुलिस स्वयं हो रही हिंसा का शिकार, आम आदमी की सुरक्षा दांव पर
छत्तीसगढ़ में इन दिनों अपराधियों के हौसले बुलंद नजर आ रहे हैं लगातार राजधानी सहित तमाम जिला संभागों व ब्लॉक मुख्यालयों में वारदात ही वारदात नजर आ रहे हैं वही राजधानी पुलिस के कुछ सिपाही भी अपने साथ मारपीट व बदसलूकी एफआईआर थानों में दर्ज करवा चुके हैं बढ़ रहे अपराधियों के हौसले पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं आखिरकार जो रक्षक स्वयं शिकार होकर अपनी शिकायत थाने में करेगी वह जनता की रक्षा कैसे करें करेगी बहुत सारे सवाल लगातार पुलिस के कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं आखिर पुलिस उगाही और वसूली के नाम से ही क्यों जानी जाती है। पुलिस का नाम लेते ही लोगों में भय की जगह घूस की भावना जाग जाती है आज पुलिस से अपराधियों का भय समाप्त हो चुका है वर्तमान समय की बात करें तो उरला खमतराई गोगांव गुढियारी खरोरा भाटा गांव कालीबाड़ी टिकरापारा संतोषी नगर टाटीबंध सहित ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहां अपराधियों का आतंक नजर ना आता हो आखिरकार पुलिस कब तक वसूली और अपराधों को बढ़ावा देने के नाम से जानी जाती रहेगी एक तरफ पुलिस के अफसर बड़े-बड़े मेडल लेते हैं वहीं दूसरी तरफ राजधानी में अपराधी रिपोर्ट लिखाने के नाम पर घर में घुसकर दोबारा मारपीट करते हैं उन्हें ना पुलिस का भय और ना ही सरकार भय है ऐसा आम लोगों का मानना है। लोगों से जब भी चर्चा करो पुलिस के प्रति क्रोध एवं नकारात्मक भाव ही चेहरे पर दिखाई देता है। पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कार्यवाही नहीं करने का ही नतीजा है। शहर एवं प्रदेश में अपराधों के ग्राफ में लगातार इजाफा हो रहा है। चौक-चौराहों पर लगे सीसीटीवी कैमरे भी अपराधियों के अपराध को नियंत्रित कर पाने में विफल है। ऐसी स्थिति में जबकि खुद पुलिस वाले ही आए दिन हिंसा का शिकार होते हैं तब उपरोक्त स्थिति में आम आदमी अपनी सुरक्षा के लिए किससे गुहार लगाए यह यक्ष प्रश्न प्रदेश सरकार से जरूर किया जाना चाहिए।







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