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जनता के बीच चुनावी रेवड़ियां बांटने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता होगी रद्द? जानिए कोर्ट की अहम टिप्पणी

जनता के बीच चुनावी रेवड़ियां बांटने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता होगी रद्द? जानिए कोर्ट की अहम टिप्पणी
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 नई दिल्ली। चुनावी मौसम में लोकलुभावने वादों के सहारे सियासी दलों द्वारा जनता को रिझाने का चलन हिंदुस्तान की राजनीति में वर्षों से चला आ रहा है। जनता भी इन दलों के लुभावने वादों के गिरफ्त में आकर इनकी झोली में वोटों की बारिश कर जाती है और जब यही लोग सत्ता के शीर्ष पर काबिज हो जाते हैं, तो खुद को सर्वेसर्वा समझकर जनता की अपेक्षाओं को ना महज उपेक्षित करते हैं, बल्कि इन्हीं जनता को हिकारत भरी निगाहों से देखने की भी हिमाकत करते हैं, लेकिन अब समय बदल चुका है। बीते दिनों तो खुद एक जनसभा को संबोधित करने के क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी रेवड़ियों के सहारे जनता को रिझाने वाले राजनेताओं की जमकर क्लास लगा डाली थी। इसके बाद बीजेपी के कई नेताओं ने पीएम मोदी के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस मसले का जिक्र किए जाने के बाद उन सभी सियासी दलों को मिर्ची लग गई, जो जनता के बीच चुनावी मौसम में रेवड़ियां बांटे फिरते हैं। कोई गुरजे नहीं कहने में कि इस जमात में दिल्ली के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी शुमार हैं। वे खुद कई मर्तबा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस मसले का जिक्र किए जाने पर एतराज जता चुके हैं, लेकिन बीजेपी संभवत: ऐसे नेताओं के खिलाफ एक्शन मोड में आ चुकी है, जो फ्री की रेवड़ियों का सहारा लेकर जनता को रिझाते हैं। आज तो सुप्रीम कोर्ट में इस पूरे मसले पर सुनवाई भी हुई।

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दरअसल, बीजेपी नेता व अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसमें उन्होंने उन सभी राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करने की मांग की थी, जो चुनावी मौसम के दौरान जनता को रिझाने हेतु लोकलुभावने वादे करते हैं। बीजेपी नेता ने अपनी याचिका में उल्लेख किया था कि राजनीतिक दलों द्वारा महज सत्ता प्राप्ति करने की इच्छा से किए जाने वाले लोक लुभावने वादों की वजह से देश की अर्थव्यस्था को नुकसान पहुंचता है, लिहाजा यह अनिवार्य रहेगा कि ऐसे सभी दलों की मान्यता को रद्द कर दिया जाए, लेकिन कोर्ट ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की मान्यता रद्द करना उसके क्षेत्राधिकार में नहीं आता है। और ऐसा करना भी अलोकतांत्रिक रहेगा।

यह काम चुनाव आयोग का है। अब कोर्ट ने इस पूरे मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख आगामी 17 अगस्त  मुकर्रर की है। अब ऐसे में देखना होगा कि कोर्ट की तरफ से इस पूरे मसले में क्या कुछ प्रतिक्रिया सामने आती है। खबरों की मानें सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में चुनाव आयोग से भी संपर्क साधा है। अब देखना होगा कि आगामी दिनों में इस पूरे मसले पर क्या कुछ फैसला लिया जाता है।


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