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बस्तर दशहरा: काछन देवी की अनुमति से शुरू हुआ ऐतिहासिक बस्तर दशहरा

 बस्तर दशहरा: काछन देवी की अनुमति से शुरू हुआ ऐतिहासिक बस्तर दशहरा
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जगदलपुर। काछनगुड़ी मंदिर में काछन देवी ने कल शाम को बस्तर दशहरा बनाने की अनुमति बेल के कांटों के झुलते हुए बस्तर राजपरिवार के सदस्यों को फूल और प्रसाद देकर बस्तर दशहरा के आयोजन की अनुमति दी। आम तौर पर 75 दिनों तक चलने वाले, लेकिन इस साल अधिमास होने के कारण 104 दिन तक चलने वाले बस्तर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा पर्व को मनाने के लिए बेल के कांटों में झूलती काछन देवी अनुराधा ने दशहरा मनाने की अनुमति और आशीर्वाद दिया।

 
इसके साथ ही राजपरिवार के सदस्य शहर के बीचोंबीच स्थित गोलबाजार में रैला देवी से भी आर्शीवाद लेने पहुंचे जहां रैला देवी ने भी निर्विध्न दशहरा के लिए आर्शीवाद प्रदान किया। इसके साथ ही दंतेवाड़ा की मॉ दंतेश्वरी देवी तथा अंचल के अन्य देवी-देवताओं को निमत्रंण पत्र भेजा गया।

 
भंगाराम चैक स्थित काछनगुड़ी में काछनदेवी से बस्तर दशहरा के आयोजन की अनुमति मांगने के लिए सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष दीपक बैज, सहित महाराजा कमलचंद्र भंजदेव तथा पुजारी व राजगुरू, कलेक्टर रजत बंसल सहित बस्तर दशहरा समिति के सदस्य और विभिन्न समाज के प्रतिनिधि सम्मिलित थे। मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म काछन पूजा आज अश्विन अमावस्या को भंगाराम चैक स्थित काछनगुड़ी में पूरी हुई, जहां नौ दिनों से उपवास कर रही नाबालिग बालिका अनुराधा को देवी की सवारी आने पर उसे बेल के कांटों से तैयार झूले पर झुलाया गया। काछन देवी ने राज परिवार के सदस्यों सहित भक्तों को प्रसाद और आशीर्वाद देकर पर्व मनाने की अनुमति दी।

 
बस्तर में निवास करने वाली विभिन्न समुदायों के सहयोग से आयोजित विश्व प्रसिद्ध यह दशहरा पर्व जातीय समभाव का अनुपम उदाहरण है। इसमें सभी जाति के लोगों को जोडकर इनकी सहभागिता निश्चित की गई है। इसीलिए यह जन-जन का पर्व कहलाता रहा है। इस महापर्व के लिए काछनदेवी के रूप में पनका जाति की बालिका की अनुमति सामाजिक एकता की भावना और नारी सम्मान का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस बार लगातार पांचवें साल बस्तर दशहरा निर्विघ्न और सफलतापूर्वक संपन्न होने का आशीर्वाद ग्राम मारेंगा की 11 वर्षीय अनुराधा ने दिया।


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