विभाग की बड़ी लापरवाही: ऐतिहासिक पुरावशेषों का 15 सालों से नहीं हुआ भौतिक सत्यापन, क्या ऐसे सम्हालेंगे अपने धरोहरों को..
रायपुर, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के महंत घासीदास संग्रहालय में रखे पुरावशेषों के संरक्षण को लेकर विभाग की लापरवाही सामने आई है। सन 2006 से अब तक संग्रहालय में संग्रहित ऐतिहासिक महत्व की मूर्तियों एवं सोने-चांदी के सिक्के, औजार व अन्य पुरावशेषों का भौतिक सत्यापन नहीं किया गया है। इससे संग्रहालय में रखे एतिहासिक पुरावशेष किस हालात में हैं, इसकी विभागीय अधिकारी कोई सुध नहीं ले रहे। ऐसे में संग्रहालय में हजारों साल पुराने इतिहास को जीवित रखे उन पुरावशेषों के खोने, क्षतिग्रस्त व नष्ट होने का डर सता रहा है। अगर ऐसा हुआ, तो वर्तमान व आने वाली हमारी पीढ़ी इतिहास के उस प्रमाण से जुड़ी सभ्यता व संस्कृति को जानने से वंचित रह जाएगी।
गौरतलब है कि सरकारें भू-गर्भ से निकली पुरातात्विक महत्व की धरोहरों को संजोने व संग्रहालयों में संग्रहित करने लाखों करोड़ों रुपए खर्च करती है, लेकिन विभागीय अधिकारियों की लापरवाही व भ्रष्टनीति के कारण वह हजारों साल पुरानी संस्कृति, सभ्यता के दर्शन कराने वाली व एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विद्यमान रहने वाले बहुमूल्य पुरावशेष या तो नष्ट हो जाते हैं या बाजार में नीलाम हो जाते हैं। इन्हीं अनियमितताओें से पुरावशेषों को बचाने शासन ने संग्रहालय में रखे पुरावशेषों का निश्चित समय पर भौतिक सत्यापन करने की व्यवस्था बनाई है, ताकि यह पता चल सके कि वह पुरावशेष सुरक्षित हैं या नहीं हैं, लेकिन संस्कृति विभाग द्वारा संग्रहालय में रखे पुरावशेषों का भौतिक सत्यापन समय पर नहीं किया जा रहा।
हर साल तैयार करनी है रिपोर्ट विभाग के पुरातत्विविदों का कहना है कि संग्रहालय में संग्रहित पुरावशेष का प्रति वर्ष भौतिक सत्यापन करना अनिवार्य है, लेकिन महंत घासीदास संग्रहालय के पुरावशेष का लंबे समय से भौतिक सत्यापन नहीं होने के कारण विभाग को भी संग्रहालय में रखे ऐतिहासिक व बहुमूल्य पुरावशेषों की सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। वहीं विभाग के अन्य अधिकारियों व पुरातत्विविदों ने यह आरोप लगाया है कि 2006 में पुरावशेष विभाग के प्रभार से मुक्त हुए एक विभागीय अधिकारी की मनमानी के कारण भौतिक सत्यापन का कार्य अटका हुआ है।




