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Marriage Partner : मनपसंद जीवनसाथी पाने का ये है सर्वोत्तम उपाय, एक बार आजमाएं

Marriage Partner : मनपसंद जीवनसाथी पाने का ये है सर्वोत्तम उपाय, एक बार आजमाएं
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 Marriage Partner : शादी हर किसी के जीवन का महत्वपूर्ण फैसला होता है। लोग कभी न कभी तो शादी करते ही है। ऐसे में सभी को मनपंसद जीवनसाथी की तलाश रहती है। कुछ की तलाश पूरी हो जाती है तो कई ऐसे भी है जिनकी ये तलाश अधूरी रह जाती है। ऐसे में अगर आप भी मनपसंद जीवनसाथी तलाश कर रहे है या फिर प्रेमी से ही विवाह करने के इच्छुक है. तो करे यह उपाय, आप नियमित रूप से इंद्रकृत श्रीकृष्ण स्तोत्र का संपूर्ण पाठ कर सकते हैं। मान्यता है कि इसका पाठ करने से भगवान कृष्ण की कृपा से प्रेम जीवन, वैवाहिक जीवन और धन से जुड़ी सभी पेरशानियों का निवारण हो जाता है।

श्रीकृष्ण स्तोत्र—

अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरुपं सनातनम् ।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तकम् ॥ १ ॥
भक्तध्यानाय सेवायै नानारुपधरं वरम् ।
शुक्लरक्तपीतश्यामं युगानुक्रमणेन च ॥ २ ॥
शुक्लतेजःस्वरुपं च सत्ये सत्यस्वरुपिणम् ।
त्रेतायां कुङ्कुमाकारं ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा ॥ ३ ॥
द्वापारे पीतवर्णं च शोभितं पीतवाससा ।
कृष्णवर्णं कलौ कृष्णं परिपूर्णतमं प्रभूम् ॥ ४ ॥
नवधाराधरोत्कृष्टश्यामसुन्दरविग्रहम् ।
नन्दैकनन्दनं वन्दे यशोदानन्दनं प्रभुम् ॥ ५ ॥
गोपिकाचेतनहरं राधाप्राणाधिकं परम् ।
विनोदमुरलीशब्दं कुर्वन्तं कौतुकेन च ॥ ६ ॥
रुपेणाप्रतिमेनैव रत्नभूषणभूषितम् ।
कन्दर्पकोटिसौनदर्यं बिभ्रन्तं शान्तमीश्र्वरम् ॥ ७ ॥
क्रीडन्तं राधया सार्धं वृन्दारण्ये च कुत्रचित् ।
कुत्रचिन्निर्जनेऽरण्ये राधावक्षःस्थलस्थितम् ॥ ८ ॥
जलक्रीडां प्रकुर्वन्तं राधया सह कुत्रचित् ।
राधिकाकबरीभारं कुर्वन्तं कुत्रचिद् वने ॥ ९ ॥
कुत्रचिद्राधिकापादे दत्तवन्तमलक्तकम् ।
राधाचर्वितताम्बूलं गृह्णन्तं कुत्रचिन्मुदा ॥ १० ॥
पश्यन्तं कुत्रचिद्राधां पश्यन्तीं वक्रचक्षुषा ।
दत्तवन्तं च राधायै कृत्वा मालां च कुत्रचित् ॥ ११ ॥

कुत्रचिद्राधया सार्धं गच्छन्तं रासमण्डलम् ।
राधादत्तां गले मालां धृतवन्तं च कुत्रचित् ॥ १२ ॥
सार्धं गोपालिकाभिश्र्च विहरन्तं च कुत्रचित् ।
राधां गृहीत्वा गच्छन्तं विहायतां च कुत्रचित् ॥ १३ ॥
विप्रपत्नीदत्तमन्नं भुक्तवन्तं च कुत्रचित् ।
भुक्तवन्तं तालफलं बालकैः सह कुत्रचित् ॥ १४ ॥
कालीयमूर्न्धिपादाब्जं दत्तवन्तं च कुत्रचित् ।
विनोदमुरलीशब्दं कुर्वन्तं कुत्रचिन्मुदा ॥ १५ ॥
गायन्तं रम्यसंगीतं कुत्रचिद् बालकैः सह ।
स्तुत्वा शक्रः स्तवेन्द्रेण प्रणनाम हरिं भिया ॥ १६ ॥
पुरा दत्तेन गुरुणा रणे वृत्रासुरेण च ।
कृष्णेन दत्तं कृपया ब्रह्मणे च तपस्यते ॥ १७ ॥
एकादशाक्षरो मन्त्रः कवचं सर्वलक्षणम् ।
दत्तमेतत् कुमाराय पुष्करे ब्रह्मणा पुरा ॥ १८ ॥
कुमारोऽङगिरसे दत्तो गुरवेऽङगिरसा मुने ।
इदमिन्द्रकृतं स्तोत्रं नित्यं भक्त्या च यः पठेत् ॥ १९ ॥
इह प्राप्य दृढां भक्तिमन्ते दास्यं लभेद् ध्रुवम् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिशोकेभ्यो मुच्यते नरः ॥ २० ॥
न हि पश्यति स्वप्नेऽपि यमदूतं यमालयम् ॥ २१ ॥
॥ इति श्रीब्रह्मवैर्तपुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे इंद्रकृत श्रीकृष्ण ॥


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