अर्थशास्त्र कहता है कि, जब मांग (aggregate demand) में कमी होने लगे तो यह समस्या मंदी कहलाती है।
अब प्रश्न ये कि, मांग में कमी क्यों? तो इसका दूसरा पहलू है मांग को सक्षम बनाने वाले साधन मतलब रूपये/धन। जो आपके रोज़गार/ स्वरोजगार पर निर्भर है और आपका रोज़गार देश में होने वाले उत्पादन, उपभोग व वितरण और सरकार की आर्थिक नीतियों पर निर्भर करता है। देश की आर्थिक वृद्धि लोगों की आय और ख़र्च को गुणात्मक रूप से बढ़ाती है वहीं मंदी लोगों की आय में कमी कर खर्च को मनोवैज्ञानिक तरीक़े से सीमित करती है। आर्थिक सुस्ती लोगों में भावी आर्थिक संकट के प्रति जागरूकता पैदा करती और उनके ख़र्च की प्रवृति को सीमित कर मांग को पहले की अपेक्षा और अधिक कम कर देती है। यही कमी भीषण मंदी का रूप ले लेती है और इसको प्रभावित करती है सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीतियां। एक स्पष्ट संतुलित आर्थिक नीति देश में आर्थिक वृद्धि लाती है वहीं दूसरी ओर असंतुलित आर्थिक नीतियां देश में महगांई, बेरोजगारी और मंदी जैसी चुनौतियां लाती है। आर्थिक विकास लोगों की आय, उपभोग (मांग), बचत और निवेश की मात्रा को बढ़ाती है वहीं मंदी लोगों की आय, मांग, बचत और निवेश की क्षमता को गुणात्मक (multiple) रूप से कम करती है। अर्थव्यवस्था के इस आवरण से कोई भी व्यक्ति अछूता नहीं रहता है। अर्थव्यवस्था का यह आवरण/चक्र देश के सभी लोगों (निम्न-आय, मध्यम-आय और उच्च-आय) को समय दर समय प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी की समस्या पर चर्चा जारी है और इसके लक्षण, प्रभाव और परिणाम हम सभी के सामने है व आ रहे हैं। अर्थव्यवस्था के सभी सेक्टर- gdp growth, कृषि, उद्योग, बैंकिंग, एनबीएफसी, शेयर बाजार, एविएशन, टेलीकॉम, माइनिंग, रियल एस्टेट, पेट्रोलियम, टेक्सटाइल, चाय, चीनी, बिस्किट,ऑटोमोबाइल , विदेश व्यापार और पूरा ही कोर सेक्टर आज भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा है।अर्थव्यवस्था की सरंचना पर बात करें तो यहां देश की आबादी का लगभग 70 फ़ीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र के रूप में है जो ग्रामीण-शहरी क्षेत्र में फैले होने के साथ ही घरेलू मांग (domestic demand) को भी पूरा करता है। यह हिस्सा ज्यादातर नगद लेनदेन (cash economy) पर ही निर्भर है। शेष लगभग 30 फ़ीसदी हिस्सा संगठित क्षेत्र में संलग्न है जिनकी संरचना (रोजगार/व्यवसाय), प्राय: आबादी की इस 70 फ़ीसदी हिस्से की मांग पर निर्भर है। अर्थव्यवस्था में यह समस्या आज से लगभग आठ-नौ वर्ष पहले प्रारंभ हुई। जब हद तक भ्रष्टाचार, लालफिताशाही, परियोजनाओं में लेटलतीफी, क्रोनी कैपिटलिज्म और पॉलिसी पैरालिसिस के प्रश्नों के रूप में तात्कालिक सरकार काम कर रही थी। इन्हीं सब कारणों से आम चुनाव के बाद देश में नई सुधारों की आकांक्षाओं के साथ सत्ता परिवर्तन हुआ। सत्ता परिवर्तन के साथ विगत वर्षों में जहां आर्थिक नीतियों और पुरानी व्यवस्थाओं में परिवर्तन तो हुए लेकिन एक स्पष्ट और प्रभावी विकल्प तैयार नहीं हुए। इसके कई उदाहरण आपको अभी मिलेंगे। समस्या आज भी वही रह गई है, केवल इसके स्वरूप में परिवर्तन माना जा-सकता है। अर्थव्यवस्था में नोटबंदी (demonetization) के प्रयोग अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाई, उल्टा इससे मुद्रा संकुचन (कैश की कमी) बढ़ा। जिससे असंगठित क्षेत्र और उससे जुड़े लोगों का रोज़गार ख़त्म हो गया और आज इसका प्रभाव संगठित क्षेत्र (liquidity cricess) में भी पड़ रहा है। बाद में आरबीआई के पास लगभग निन्याबे फ़ीसदी करेंसी वापस आ गई जो इस प्रयोग की सारी सीमाओं को बताती है। इसका दूसरा हिस्सा कैशलेस व्यवस्था को लागू करने का प्रयास रहा लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में यह भी एक चुनौती ही है जहां आबादी का एक हिस्सा बुनियादी सुविधाओं शिक्षा, बिजली, तकनीकी और इंटरनेट जैसी संचार सुविधाओं से पूर्णतः परिचित नहीं है। साथ ही साथ उन संस्थानों के भी दायित्व स्थापित नहीं किए जा सकें, जिन्होंने 'बैंकों की जगह' इस दौरान इसका बड़ा लाभ लिया। देश में कर सुधारों (tax reform) की आश्यकता काफ़ी समय से थी। तर्कसंगत कर सुधार देश में कीमत नियंत्रण, राजकोष और लोगों की क्रय-क्षमता में वृद्धि करते है। अप्रत्यक्ष कर सुधार के रूप में एक नई कर व्यवस्था जीएसटी (goods & service tax) लाई गई। जीएसटी की जटिल और लगातार परिवर्तनकारी संरचना ने एक तरफ व्यापार-व्यवसाय को तो दूसरी तरफ इसके उच्च कर दरों (5% से 28% तक) ने लोगों की क्रय-क्षमता को कम कर दिया। उच्च कर दरों ने उत्पादों की कीमतों बढ़ाकर लोगों की मांग प्रवृति को कम कर दिया जिससे उत्पादन में कमी आयी और आगे रोज़गार ख़त्म होने लगा। इसका तीसरा प्रभाव अब सरकार के राजकोष में कर राजस्व (tax revenue) में होने वाली कमी के रूप में दिख रहा है। अर्थव्यवस्था में बैंकों की भूमिका दो हिस्सों को जोड़ने वाले ब्रिज की तरह होती है, जहां बैंक एक तरफ उद्योगों को पूंजी देकर आपूर्ति को सुनिश्चित करती हैं तो दूसरी तरफ लोगों को लोन देकर मांग को बढ़ाती हैं। लेकिन अब पूरा बैंकिंग सिस्टम ही अपने एनपीए और बाजार जोख़िम की समस्याओं में ही उलझ कर रह गया है। इसका प्रभाव अब दोनों ही (उद्योग-उपभोक्ता) हिस्सों पर दिख रहा है।
इसी से एक समस्या दोहरे तुलन पत्र (twin balance sheet) की भी सामने आई है। जहां एक ओर बैंकों का बढ़ता हुआ एनपीए (डूबत-ऋण) और वहीं दूसरी ओर कंपनियों का बढ़ता हुआ घाटा। इससे भी आर्थिक सुस्ती बढ़ी है। अर्थव्यवस्था में प्रत्येक क्षेत्र एक-दूसरे जुड़ी रहती है और एक क्षेत्र में होने वाला असंतुलन अन्य दूसरे क्षेत्र को भी प्रभावित करता है। रियल एस्टेट जिस पर सीमेंट, स्टील, ब्रिक, टाइल्स, हार्डवेयर, इलेक्ट्रिकल प्रोडक्ट्स और ऐसे ही कई अन्य क्षेत्र जुड़े रहते हैं। यह सेक्टर पूरी तरह से रूका हुआ है, जिसका प्रभाव इससे जुड़े क्षेत्रों पर भी हो रहा है। विदेश व्यापार के मामले में भी कोई बड़ा सुधार नहीं हो पाया है। भारत की विश्व व्यापार में लगभग दो फ़ीसदी (1.8%) की ही हिस्सेदारी है। आज ट्रेड वॉर से उत्पन्न नए बाज़ार अवसरों का लाभ हम उठाने की स्थिति में नहीं है क्योंकि हमारा पूरा उत्पादन ही प्रभावित हो गया है। गिरते रूपये से हमारा आयात (petro products etc.) महंगा हो रहा है जिसका प्रभाव अन्य क्षेत्रों पर पड़ रहा है। जहां लाभ नहीं, वहां निवेश क्यों? शेयर बाजार में विगत दिनों से लगातार घटता पूंजी-निवेश इस संकट की ओर संकेत दे रहा है। अब 'सुधारों' की ओर देखें तो सरकार इस पर कुछ पहल कर रही है। बैंकों के विलय, क्षेत्रवार घोषणाएं, आरबीआई से ऋण (1.76 लाख करोड़ ₹), कॉरपोरेट्स को दी जाने वाली राहतें ये सभी केवल 'सप्लाई साइड' के उपाय मात्र है। इसके अलावा डिमांड को तैयार करने के लिए इस बात को समझा जाना महत्वपूर्ण है कि, जब तक आबादी/उपभोक्ता के पास साधन/पैसे नहीं जायेंगे तब तक अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाना संभव नहीं है। एक बार मांग तैयार हो जाता है तो स्वत: ही देश का आर्थिक विकास आगे बढ़ने लगता है। वर्तमान समय में अर्थव्यवस्था को 'बड़े संरचनागत सुधारों' की आवश्यकता है जो मांग और आपूर्ति दोनों हिस्सों को गति दे। अर्थव्यवस्था में उतार- चढ़ाव (तेजी-मंदी) देखने को मिलता ही है और ऐसे ही संघर्षों से अर्थव्यस्थाएं विकास कर विकसित होती हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था भी इन्हीं संघर्षों के बीच है।