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Breast Cancer Alert: महिलाएं सावधान! देर रात जागने की आदत बन रही बड़ा खतरा, ज़रा सी अनदेखी...

Breast Cancer Alert: महिलाएं सावधान! देर रात जागने की आदत बन रही बड़ा खतरा, ज़रा सी अनदेखी...

Breast Cancer Alert : भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद डरावनी रिपोर्ट सामने आई है। ब्रेस्ट कैंसर (स्तन कैंसर) के मामले अब न केवल बढ़ रहे हैं बल्कि यह युवा महिलाओं को भी अपना शिकार बना रहे हैं। हालिया शोध और आईसीएमआर (ICMR) की स्टडी में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि हमारी बदलती जीवनशैली खासकर नींद की कमी और तनाव इस कैंसर के पीछे के सबसे बड़े कारण बनकर उभरे हैं।

चिंताजनक आंकड़े: अब युवाओं पर भी खतरा

नेशनल सेंटर फॉर डिजीज इंफॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च के अनुसार भारत में ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में सालाना 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। पहले यह बीमारी 50 साल के बाद देखी जाती थी लेकिन अब 35 से 50 साल की महिलाएं इसकी चपेट में सबसे ज्यादा आ रही हैं। देर से शादी, बच्चों को स्तनपान (Breastfeeding) न कराना और शारीरिक गतिविधियों की कमी इसके मुख्य कारण हैं।

नींद की कमी और कैंसर का संबंध

क्या आप जानते हैं कि कम सोना कैंसर को दावत दे सकता है? स्टडी में सामने आया है कि नींद पूरी न होने से 'मेलाटोनिन' हार्मोन कम बनता है जिससे एस्ट्रोजन का स्तर बिगड़ जाता है। गहरी नींद के दौरान शरीर अपने सेल्स और DNA की मरम्मत करता है। नींद की कमी इस प्रक्रिया को रोक देती है जिससे कैंसर की कोशिकाएं पनपने लगती हैं। लगातार थकान शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती है।

मोटापा और एस्ट्रोजन का खतरनाक खेल

विशेषज्ञों के अनुसार पेट के आसपास जमा चर्बी ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ा देती है। शरीर का बढ़ा हुआ वजन सूजन पैदा करता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाता है। मेनोपॉज के बाद शरीर में जमा फैट ही एस्ट्रोजन का मुख्य जरिया बन जाता है। एस्ट्रोजन का अधिक स्तर ब्रेस्ट सेल्स में कैंसर की गांठ बना सकता है।

रोज दर्द की दवा ले रहे हैं? सावधान! धीरे-धीरे खराब हो सकती है किडनी और लिवर

रोज दर्द की दवा ले रहे हैं? सावधान! धीरे-धीरे खराब हो सकती है किडनी और लिवर

 नेशनल डेस्क: दर्द से तुरंत राहत देने वाली पेन किलर दवाएं जैसे NSAIDs (इबुप्रोफेन, डाइक्लोफेनाक, नेप्रोक्सन) और पैरासिटामोल आमतौर पर सुरक्षित मानी जाती हैं, लेकिन अगर इन्हें लंबे समय तक या बिना डॉक्टर की सलाह के लिया जाए, तो ये शरीर के सबसे अहम अंग—किडनी और लिवर—को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन दवाओं का अत्यधिक या गलत इस्तेमाल धीरे-धीरे अंगों पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे क्रॉनिक डैमेज, ऑर्गन फेलियर तक का खतरा बढ़ सकता है।

किडनी पर पेन किलर का असर क्यों खतरनाक है?

NSAIDs शरीर में बनने वाले प्रोस्टाग्लैंडिन्स नामक केमिकल्स को रोक देती हैं। ये केमिकल्स किडनी की रक्त नलिकाओं को खुला रखने में मदद करते हैं। जब यह प्रक्रिया बाधित होती है तो किडनी में ब्लड फ्लो कम हो जाता है, फिल्ट्रेशन क्षमता घटती है,समय के साथ एक्यूट किडनी इंजरी, एनाल्जेसिक नेफ्रोपैथी या क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) हो सकती है। पैरासिटामोल सामान्य मात्रा में अपेक्षाकृत सुरक्षित है, लेकिन ओवरडोज या लंबे समय तक सेवन किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है।

ज्यादा खतरा किन लोगों में?

बुजुर्ग,हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज के मरीज ,हार्ट डिजीज वाले,और पहले से किडनी की समस्या से जूझ रहे लोग।

लिवर पर कैसे असर डालती हैं दर्द की दवाएं?

लिवर का काम दवाओं को मेटाबॉलाइज करना होता है। पैरासिटामोल की अधिक मात्रा लेने पर लिवर में मौजूद ग्लूटाथियोन खत्म हो जाता है, जिससे लिवर सेल्स को सीधा नुकसान पहुंचता है।

मरीजों के लिए खुशखबरी! अब सिर्फ एक Blood Test में ही पकड़ी जाएंगी ढेरों बीमारियां, बार-बार टेस्ट की नहीं पड़ेगी जरूरत

मरीजों के लिए खुशखबरी! अब सिर्फ एक Blood Test में ही पकड़ी जाएंगी ढेरों बीमारियां, बार-बार टेस्ट की नहीं पड़ेगी जरूरत

 ICMR Multiplex Diagnostic Test : भारत में स्वास्थ्य जांच की दुनिया में एक बड़ा बदलाव आने वाला है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) एक ऐसी आधुनिक तकनीक पर काम कर रहा है जिससे मरीजों को बार-बार अलग-अलग टेस्ट करवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। एक ही मल्टीप्लेक्स टेस्ट के जरिए अब डेंगू, कोविड, फ्लू और टाइफाइड जैसी कई बीमारियों का पता एक साथ लगाया जा सकेगा। यह कदम न केवल इलाज को तेज करेगा बल्कि देश में बढ़ते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) यानी दवाओं के बेअसर होने के खतरे को भी कम करेगा।

मौजूदा सिस्टम की चुनौती: देरी और बढ़ता खर्च

वर्तमान में जब किसी मरीज को बुखार या सांस लेने में तकलीफ होती है तो डॉक्टर लक्षणों के आधार पर एक-एक करके टेस्ट करवाते हैं। पहले एक टेस्ट होता है उसकी रिपोर्ट निगेटिव आने पर दूसरा टेस्ट लिखा जाता है। इस चक्कर में कई दिन निकल जाते हैं। सही बीमारी का पता देर से चलने के कारण मरीज की स्थिति गंभीर हो सकती है। बार-बार अलग-अलग जांच कराने से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पैसों का भारी बोझ पड़ता है।

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समाधान: मल्टीप्लेक्स मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स

ICMR जिस नई तकनीक को विकसित कर रहा है उसे मल्टीप्लेक्स टेस्ट कहा जाता है। इसकी खासियतें इस प्रकार हैं:

  1. एक सैंपल, अनेक नतीजे: मरीज के एक ही खून या स्वाब सैंपल से कई तरह के वायरस और बैक्टीरिया की पहचान हो जाएगी।

    1. सटीक इलाज: डॉक्टरों को तुरंत पता चल जाएगा कि संक्रमण का असली कारण क्या है जिससे इलाज पहले दिन से ही सही दिशा में शुरू होगा।

    2. गंभीर मरीजों के लिए वरदान: सेप्सिस (खून में जहर फैलना) जैसी स्थितियों में जहां हर मिनट कीमती होता है वहां यह तकनीक जान बचा सकती है।

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    एंटीबायोटिक दवाओं की बर्बादी पर रोक

    अक्सर जांच रिपोर्ट आने में देरी के कारण डॉक्टर मरीज को 'ब्रॉड-स्पेक्ट्रम' (तेज असर वाली) एंटीबायोटिक दवाएं दे देते हैं। ICMR की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कई आम एंटीबायोटिक्स अब बैक्टीरिया पर बेअसर साबित हो रही हैं। अगर नई जांच से बीमारी तुरंत पता चल जाती है तो डॉक्टर केवल वही दवा देंगे जिसकी जरूरत है। इससे शरीर में दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता (AMR) नहीं बढ़ेगी।

    भारत की जरूरतों के अनुसार स्वदेशी टेस्ट

    ICMR इन टेस्ट किट्स को भारत में होने वाली आम बीमारियों के डेटा के आधार पर तैयार कर रहा है। कोविड-19 ने हमें सिखाया कि बीमारी की जल्दी पहचान कितनी जरूरी है। ये नए टूल्स भविष्य में किसी भी आउटब्रेक को शुरू होते ही पकड़ने में मदद करेंगे। बच्चों में एंटीबायोटिक दवाओं के बढ़ते गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए भी विशेष डायग्नोस्टिक टूल्स पर काम किया जा रहा है।

दवाओं पर बनी रेड लाइन का क्या होता है मतलब? यहां जानें

दवाओं पर बनी रेड लाइन का क्या होता है मतलब? यहां जानें

  Red Line In Medicine: आज के समय में हम में से ज्यादातर लोग शरीर में हल्की-सी परेशानी होते ही खुद ही डॉक्टर बन जाते हैं. सिर दर्द हो, बुखार आए या पेट में दिक्कत हो, तो सीधे केमिस्ट की दुकान से पेनकिलर या एंटीबायोटिक ले लेना आम आदत बन चुकी है. लेकिन यह आदत धीरे-धीरे आपकी सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकती है. खासकर तब, जब दवा के डिब्बे पर बनी लाल रंग की सीधी रेखा को हम नजरअंदाज कर देते हैं.

दवा पर बनी लाल लाइन का असली मतलब

दवाओं के पैकेट पर बनी लाल लाइन कोई डिजाइन नहीं होती, बल्कि यह एक चेतावनी होती है. इसका साफ मतलब है कि यह दवा केवल डॉक्टर की पर्ची पर ही ली जानी चाहिए. ऐसी दवाओं में ज्यादातर एंटीबायोटिक्स, स्ट्रॉन्ग पेनकिलर्स और कुछ खास मेडिसिन शामिल होती हैं. बिना सलाह इनका सेवन करने से बीमारी ठीक होने के बजाय और बिगड़ सकती है.

Antibiotics कैसे बन जाती हैं जानलेवा?

एंटीबायोटिक्स का काम शरीर में मौजूद बैक्टीरिया को खत्म करना होता है. लेकिन जब इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह लिया जाता है या बीच में ही कोर्स छोड़ दिया जाता है, तो बैक्टीरिया इन दवाओं के खिलाफ मजबूत हो जाते हैं. इस कंडीशन को Antibiotic Resistance कहा जाता है. इसका मतलब यह है कि भविष्य में वही दवाएं गंभीर इंफेक्शन में भी असर नहीं करतीं. नतीजा यह होता है कि एक मामूली इंफेक्शन भी जानलेवा बन सकता है.

हर दवा हर शरीर के लिए नहीं होती

लाल लाइन यह भी समझाती है कि हर दवा हर व्यक्ति के लिए सेफ नहीं होती. उम्र, वजन, बीमारी की गंभीरता और पहले से चल रही दवाओं को देखकर ही डॉक्टर सही मेडिसिन और उसकी डोज तय करते हैं. खुद से दवा लेने से लिवर, किडनी और डाइजेस्टिव सिस्टम पर बुरा असर पड़ सकता है. कई बार दवा बीमारी को दबा देती है, जिससे असली समस्या समय पर पकड़ में नहीं आती.

Diabetes की दवा भी फेल! रोज 30 मिनट करें ये काम, शुगर लेवल खुद हो जाएगा कंट्रोल

Diabetes की दवा भी फेल! रोज 30 मिनट करें ये काम, शुगर लेवल खुद हो जाएगा कंट्रोल

 नेशनल डेस्क। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियां आम हो गई हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन गंभीर समस्याओं का समाधान जिम की महंगी मशीनों में नहीं बल्कि आपके रोजमर्रा के छोटे-छोटे बदलावों में छिपा है? डॉक्टरों का मानना है कि एक्सरसाइज इन बीमारियों के लिए किसी जादुई दवा की तरह काम करती है।

शुगर कंट्रोल करने का सबसे आसान तरीका: 'ब्रिस्क वॉकिंग'

अगर आप टाइप-2 डायबिटीज से जूझ रहे हैं तो रोजाना 30 मिनट की तेज चाल (Brisk Walking) आपके लिए रामबाण है। 3 महीने तक नियमित चलने से HbA1c लेवल में 0.5 से 1% तक की कमी आ सकती है। चलने से शरीर इंसुलिन का बेहतर इस्तेमाल करता है और खून में जमा शुगर ऊर्जा के रूप में खर्च हो जाती है। इतनी तेज चलें कि आप बात तो कर पाएं लेकिन गाना न गा सकें। दिन में 8,000 से 10,000 कदम चलने का लक्ष्य रखें।

हाई बीपी के लिए योग और प्राणायाम

हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) को कंट्रोल करने के लिए योग एक प्राकृतिक उपचार है।

प्रमुख आसन: बालासन, भुजंगासन और 'लेग्स-अप-द-वॉल' पोज।

नतीजे: शोध बताते हैं कि 8 हफ्तों तक रोजाना 15 मिनट योग करने से सिस्टोलिक बीपी 10-15 पॉइंट तक गिर सकता है।

तनाव मुक्ति: योग के साथ गहरी सांस लेने (Deep Breathing) से नसें रिलैक्स होती हैं और दिल की धड़कन संतुलित रहती है।

दिल की सुरक्षा के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग

मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज न केवल बॉडी बनाती हैं बल्कि दिल के बोझ को भी कम करती हैं। हफ्ते में 2 दिन स्क्वैट्स, वॉल पुश-अप्स और प्लैंक जैसी कसरत करें। मजबूत मसल्स शुगर को जल्दी सोखती हैं जिससे खराब कोलेस्ट्रॉल घटता है और कमर का घेरा (Waist Size) कम होता है। हर एक्सरसाइज के 10-10 रिपीटेशन से शुरू करें।

स्विमिंग और HIIT: अन्य बेहतरीन विकल्प

तैराकी (Swimming): अगर आपके घुटनों में दर्द है तो तैराकी सबसे अच्छी है। यह पूरे शरीर की एक्सरसाइज है और दिल की चर्बी घटाती है। 20 मिनट की हाई-इंटेंसिटी इंटरवल ट्रेनिंग कम समय में ज्यादा फायदा देती है।

रोजाना की छोटी आदतें, बड़े बदलाव

किसी भी कसरत का पूरा फायदा तभी मिलता है जब आप नियमित रहें।

खाने के बाद टहलें: दोपहर और रात के खाने के बाद 10 मिनट जरूर चलें।

सीढ़ियों का प्यार: लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें।

धूप और वॉक: सुबह की धूप में 10 मिनट टहलने से विटामिन-D भी मिलता है और मूड भी अच्छा रहता है।

शराब शरीर के किस अंग को करती है सबसे ज्यादा Damage? लिवर या फिर...

शराब शरीर के किस अंग को करती है सबसे ज्यादा Damage? लिवर या फिर...

 Impact of Alcohol : शराब का सेवन सेहत के लिए खतरनाक है यह बात हम सभी जानते हैं लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि शराब शरीर के किस अंग को सबसे ज्यादा और सबसे पहले निशाना बनाती है लिवर या किडनी? सीनियर फिजिशियन डॉ. सचिन भार्गव के अनुसार शराब का असर पूरे शरीर पर पड़ता है लेकिन लिवर वह अंग है जो सबसे पहले और सीधे तौर पर डैमेज होता है।

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लिवर पर शराब का जानलेवा प्रहार

डॉ. सचिन बताते हैं कि जब आप शराब पीते हैं तो उसे पचाने और जहरीले तत्वों को बाहर निकालने की जिम्मेदारी लिवर की होती है। शराब को फिल्टर करने की प्रक्रिया में लिवर की कोशिकाएं (Cells) मरने लगती हैं। शराब का सबसे पहला लक्षण लिवर में चर्बी जमा होना है। लंबे समय तक शराब पीने से लिवर पर स्थायी घाव (Scarring) बन जाते हैं जिसे 'सिरोसिस' कहा जाता है। यह एक जानलेवा स्थिति है जिसमें लिवर काम करना बंद कर देता है।

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किडनी पर कैसे पड़ता है असर?

किडनी का काम खून को छानना है लेकिन शराब इस प्रक्रिया को मुश्किल बना देती है:

  • डिहाइड्रेशन (पानी की कमी): शराब एक 'मूत्रवर्धक' (Diuretic) है जिससे बार-बार पेशाब आता है और शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इससे किडनी पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है।
  • हाई ब्लड प्रेशर: शराब पीने से बीपी बढ़ता है जो दुनिया भर में किडनी फेलियर का सबसे बड़ा कारण है।
  • हेपेटोरेनल सिंड्रोम: जब शराब के कारण लिवर गंभीर रूप से खराब होता है तो वह किडनी को भी साथ में फेल कर देता है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को 'हेपेटोरेनल सिंड्रोम' कहा जाता है।

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क्या शराब छोड़ने पर अंग दोबारा ठीक हो सकते हैं?

डॉ. सचिन भार्गव के अनुसार एक अच्छी खबर यह है कि मानव शरीर में खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता होती है:

  1. रिकवरी संभव है: यदि कोई व्यक्ति शुरुआती लक्षणों के दौरान शराब पूरी तरह छोड़ देता है तो लिवर और किडनी को पहुँचा नुकसान धीरे-धीरे कम होने लगता है और वे फिर से सामान्य रूप से काम कर सकते हैं।
  2. विड्रॉल लक्षण: अचानक शराब छोड़ने पर घबराहट या बेचैनी महसूस हो सकती है। इसे डॉक्टर की सलाह, दवाइयों और काउंसलिंग से आसानी से ठीक किया जा सकता है।
HEALTH NEWS: सुबह उठकर ये 10 योग करने से मिलेगा शरीर और दिमाग को पूरा आराम

HEALTH NEWS: सुबह उठकर ये 10 योग करने से मिलेगा शरीर और दिमाग को पूरा आराम

 HEALTH NEWS: सुबह की शुरुआत अगर योग से की जाए तो दिनभर शरीर में ऊर्जा और मन में शांति बनी रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार रोज सुबह खाली पेट 10 आसान योगासन करने से तनाव, थकान, कमर-दर्द, गैस, मोटापा और अनिद्रा जैसी समस्याओं में काफी राहत मिलती है।

ताड़ासन, भुजंगासन, वज्रासन, पवनमुक्तासन, सूर्य नमस्कार, अनुलोम-विलोम, कपालभाति, बालासन, वृक्षासन और शवासन जैसे योग न सिर्फ शरीर को लचीला बनाते हैं बल्कि इम्यूनिटी भी बढ़ाते हैं।

नियमित योग अभ्यास से पाचन सुधरता है, ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और मानसिक तनाव कम होता है।

डॉक्टरों का कहना है कि रोज सिर्फ 20–30 मिनट योग करने से दवाओं पर निर्भरता भी कम हो सकती है और व्यक्ति खुद को दिनभर तरोताजा महसूस करता है।

आंखें दे रही चेतावनी! इस परेशानी को न करें नजरअंदाज, यह खतरनाक संकेत बन सकता है जानलेवा

आंखें दे रही चेतावनी! इस परेशानी को न करें नजरअंदाज, यह खतरनाक संकेत बन सकता है जानलेवा

 Dementia Symptoms : अब तक माना जाता था कि याददाश्त का खोना ही डिमेंशिया (Dementia) की पहली पहचान है लेकिन हाल ही में हुई एक क्रांतिकारी रिसर्च ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि आपकी आंखों की रेटिना की मोटाई यह बता सकती है कि भविष्य में आपको डिमेंशिया या अल्जाइमर होने का खतरा है या नहीं।

क्या है डिमेंशिया और आंखों से इसका रिश्ता?

डिमेंशिया दिमाग से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है जिसमें व्यक्ति की सोचने, समझने और याद रखने की शक्ति धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। चीन के वैज्ञानिकों ने करीब 30,000 लोगों पर 10 साल तक अध्ययन किया। 'फ्रंटियर्स इन एजिंग न्यूरोसाइंस' जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी के अनुसार हमारी आंखों की रेटिना (Retina) दिमाग की सेहत का आईना होती है। रेटिना आंखों के पीछे की वह परत है जो रोशनी को संकेतों में बदलकर दिमाग तक पहुंचाती है। चूंकि आंखों की नसें (Optic Nerve) सीधे दिमाग से जुड़ी होती हैं इसलिए दिमाग में होने वाली कोई भी हलचल आंखों में दिखाई दे सकती है।

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रिसर्च के चौंकाने वाले नतीजे

वैज्ञानिकों ने रेटिना की मोटाई मापने के लिए OCT (ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी) तकनीक का इस्तेमाल किया। रिसर्च में जो बातें सामने आईं वे बेहद महत्वपूर्ण हैं:

  • पतली रेटिना, बढ़ता खतरा: जिन लोगों की रेटिना की परत पतली पाई गई उनमें अल्जाइमर का खतरा काफी अधिक था।

    • 3% का गणित: रेटिना की मोटाई में हर एक यूनिट की कमी डिमेंशिया के खतरे को 3 फीसदी बढ़ा देती है।

    • फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया (FTD): जिन लोगों की रेटिना का मध्य हिस्सा बहुत पतला था उनमें FTD होने की संभावना 41 फीसदी ज्यादा पाई गई।

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    डिमेंशिया के शुरुआती लक्षण जिन्हें न करें नजरअंदाज

    अगर आप या आपके आसपास कोई इन लक्षणों का सामना कर रहा है तो सतर्क हो जाएं:

    1. याददाश्त की कमी: हाल ही में हुई बातों या नामों को भूल जाना।

    2. बोलने में कठिनाई: बातचीत के दौरान सही शब्दों का चुनाव न कर पाना।

    3. भ्रम की स्थिति: समय, स्थान या लोगों को पहचानने में देरी होना।

    4. व्यवहार में बदलाव: अचानक चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन या मूड स्विंग्स।

    5. फैसला लेने में असमर्थता: रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसले लेने में भी दिक्कत महसूस करना।

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    बचाव और सावधानी

    हालांकि डिमेंशिया का कोई पक्का इलाज नहीं है लेकिन समय रहते पहचान और सही जीवनशैली से इसे धीमा किया जा सकता है:

    • नियमित व्यायाम: शारीरिक सक्रियता दिमाग की कोशिकाओं को स्वस्थ रखती है।

    • हेल्दी डाइट: ओमेगा-3 और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर भोजन लें।

    • दिमाग की कसरत: सुडोकू, शतरंज या नई भाषाएं सीखकर दिमाग को सक्रिय रखें।

    • नियमित जांच: 50 की उम्र के बाद आंखों और न्यूरोलॉजिकल चेकअप करवाते रहें।

Health Alert : कमर से पैर तक रहता है दर्द और चलने में होती है परेशानी तो हो सकती है इस खतरनाक बीमारी का संकेत

Health Alert : कमर से पैर तक रहता है दर्द और चलने में होती है परेशानी तो हो सकती है इस खतरनाक बीमारी का संकेत

 Health Alert : आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और घंटों एक ही जगह बैठकर काम करने की आदत ने कमर दर्द को आम बना दिया है लेकिन अगर यह दर्द कमर से शुरू होकर आपके कूल्हों के रास्ते पैरों के नीचे तक जा रहा है तो इसे सामान्य दर्द समझकर नजरअंदाज न करें। यह साइटिका (Sciatica) हो सकता है जो शरीर की सबसे लंबी नस में खराबी का संकेत है।

क्या है साइटिका और यह दर्द क्यों होता है?

हमारे शरीर में साइटिका नर्व (Sciatic Nerve) सबसे लंबी और मोटी नस होती है। यह नस रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से (Lower Spine) से पांच अलग-अलग नसों के मेल से बनती है और कूल्हों से होते हुए दोनों पैरों के पिछले हिस्से तक जाती है। जब इस नस पर किसी कारण से सूजन आती है या दबाव पड़ता है तो तेज दर्द शुरू हो जाता है। इसे ही मेडिकल भाषा में साइटिका कहा जाता है।

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साइटिका के प्रमुख लक्षण: इन्हें पहचानें

साइटिका का दर्द अन्य जोड़ों के दर्द से काफी अलग होता है। यह आमतौर पर शरीर के किसी एक हिस्से (दाएं या बाएं पैर) को प्रभावित करता है। कई मरीज इसे करंट या बिजली के तेज झटके जैसा महसूस करते हैं। पैरों में झुनझुनी होना, सुन्न पड़ जाना या चलते समय कमजोरी महसूस होना इसके बड़े लक्षण हैं। लंबे समय तक बैठने या खांसने-छींकने पर यह दर्द और ज्यादा बढ़ सकता है।

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साइटिका होने की 3 मुख्य वजहें

1. हर्नियेटेड डिस्क (Herniated Disc): रीढ़ की हड्डी के बीच मौजूद डिस्क कुशन का काम करती हैं। जब कोई डिस्क चोट या दबाव के कारण फट जाती है तो उसके अंदर का तरल पदार्थ बाहर निकलकर साइटिका नस को दबाने लगता है। यह साइटिका का सबसे सामान्य कारण है।

2. रीढ़ की हड्डी में चोट: किसी दुर्घटना या गिरने की वजह से यदि रीढ़ के निचले हिस्से (Lumbar Region) पर गंभीर चोट आती है तो नसें दब सकती हैं जिससे साइटिका की समस्या पैदा हो जाती है।

3. ऑस्टियोआर्थराइटिस (गठिया): हड्डियों के जोड़ों के बीच एक कार्टिलेज नाम की चिकनी परत होती है। उम्र बढ़ने या बीमारी के कारण जब यह परत घिस जाती है तो हड्डियां आपस में टकराने लगती हैं। रीढ़ की हड्डी में यह समस्या साइटिका नस पर दबाव डालती है।

हाई बीपी और शुगर के मरीजों के लिए क्यों घातक है ठंडे पानी से नहाना, जानें वजह

हाई बीपी और शुगर के मरीजों के लिए क्यों घातक है ठंडे पानी से नहाना, जानें वजह

 सर्दियों के आते ही ज्यादातर लोग गुनगुने पानी से नहाना पसंद करते हैं, लेकिन कुछ लोग सालभर ठंडे पानी से नहाने की आदत नहीं छोड़ते। उनका मानना है कि इससे शरीर ज्यादा एक्टिव रहता है। हालांकि, यह आदत हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं होती। खासकर हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए सर्दियों में नहाने का तरीका सेहत पर सीधा असर डाल सकता है।
एक्सपर्ट की राय क्या कहती है?
लेडी हार्डिंग हॉस्पिटल के डॉक्टर एल.एच. घोटेकर के अनुसार, हाई बीपी और डायबिटीज के मरीजों के लिए सर्दियों में ठंडे पानी से नहाना आमतौर पर सुरक्षित नहीं माना जाता। ठंडा पानी शरीर के संपर्क में आते ही ब्लड सर्कुलेशन में अचानक बदलाव कर देता है। इससे शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जो इन बीमारियों में खतरा बढ़ा सकता है।

क्यों बढ़ जाता है खतरा?
ठंडे पानी से नहाने पर कुछ मरीजों को चक्कर आना, घबराहट, बेचैनी या असहजता महसूस हो सकती है। जिन लोगों का ब्लड प्रेशर या ब्लड शुगर पहले से कंट्रोल में नहीं रहता, उनमें यह जोखिम और ज्यादा हो सकता है। अचानक तापमान परिवर्तन से हार्ट और नर्वस सिस्टम पर भी असर पड़ सकता है।

गुनगुना पानी क्यों है बेहतर विकल्प?
डॉक्टरों का कहना है कि सर्दियों में हाई बीपी और डायबिटीज के मरीजों को गुनगुने पानी से नहाना चाहिए। इससे शरीर धीरे-धीरे तापमान के अनुसार ढलता है और नहाते समय किसी भी तरह की परेशानी का खतरा कम हो जाता है।

नहाते समय किन बातों का रखें ध्यान?

  • बहुत ठंडे या बहुत गर्म पानी से न नहाएं
  • खाली पेट या कमजोरी की हालत में स्नान न करें
  • बाथरूम का तापमान बहुत कम हो तो पहले शरीर को एडजस्ट होने दें
  • नहाते समय चक्कर, घबराहट या सांस की दिक्कत हो तो तुरंत स्नान रोक दें

    इन बातों का भी रखें ख्याल
    हाई बीपी और डायबिटीज के मरीजों को रोजाना ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल की जांच करनी चाहिए। संतुलित डाइट लें, पर्याप्त पानी पिएं और दवाइयों को नियमित रूप से लेते रहें। किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।

 

सर्दियों में क्यों बदल जाता है पेशाब का रंग? जानें कब है सामान्य और कब गंभीर बीमारी का संकेत

सर्दियों में क्यों बदल जाता है पेशाब का रंग? जानें कब है सामान्य और कब गंभीर बीमारी का संकेत

 सर्दियों के मौसम में शरीर में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। ठंड बढ़ने पर खानपान, पानी पीने की आदत और दिनचर्या में फर्क आ जाता है। इस दौरान कई लोग यह अनुभव करते हैं कि उनके पेशाब का रंग सामान्य से अलग दिखाई देता है। कुछ को यह गहरा पीला लगता है, तो कुछ को हल्का पीला या अलग तरह का। ऐसे बदलाव को लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल उठते हैं कि क्या यह किसी बीमारी का संकेत है।

क्या सर्दियों में पेशाब का रंग बदलना रोग का संकेत है?
लेडी हार्डिंग हॉस्पिटल की डॉ. एल.एच. घोटेकर का कहना है कि सर्दियों में पेशाब का रंग बदलना जरूरी नहीं कि किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो। ठंड के मौसम में लोग अक्सर पानी कम पीते हैं क्योंकि प्यास कम लगती है और पसीना भी कम आता है। इसके कारण शरीर में पानी की कमी हो सकती है, जो सीधे पेशाब के रंग पर असर डालती है। पर्याप्त पानी न मिलने पर पेशाब गाढ़ा हो जाता है और उसका रंग गहरा पीला दिखाई देता है।

आमतौर पर हल्का पीला रंग सामान्य माना जाता है। लेकिन यदि पेशाब का रंग बहुत गहरा पीला, भूरा, लाल या झागदार नजर आए, तो इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। यदि यह बदलाव थोड़े समय के लिए हो और किसी अन्य परेशानी के बिना अपने आप ठीक हो जाए, तो घबराने की जरूरत नहीं होती। वहीं, अगर पेशाब के रंग के साथ जलन, दर्द, बदबू, बार-बार पेशाब आना या लगातार थकान जैसी समस्याएं भी हों, तो यह किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में समय पर डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है।

कौन सी बीमारियों का खतरा हो सकता है?
पेशाब के रंग में बदलाव कुछ बीमारियों की ओर इशारा कर सकता है। इनमें यूरिनरी इंफेक्शन, किडनी से जुड़ी समस्याएं, लिवर की परेशानी या डिहाइड्रेशन शामिल हैं। इसके अलावा, कुछ मामलों में ब्लड शुगर की अनियमितता या पीलिया जैसी स्थिति में भी पेशाब का रंग बदल सकता है।

यदि पेशाब का रंग लगातार असामान्य बने रहे या उसमें खून दिखाई दे, तो यह गंभीर संकेत हो सकता है। पेशाब करते समय दर्द या जलन होना भी किसी संक्रमण का लक्षण हो सकता है। इसलिए इन लक्षणों को हल्के में लेने के बजाय समय पर जांच कराना और विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।

कैसे रखें खुद का ख्याल?

दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।

ठंड में भी प्यास लगने पर पानी न छोड़ें।

संतुलित और साफ-सुथरा आहार लें।

पेशाब को लंबे समय तक रोककर न रखें।

किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

क्या आपका दिल है एकदम फिट? इन 4 टेस्ट से तुरंत चलेगा पता, जानें कब और किस कंडीशन में किए जाते हैं

क्या आपका दिल है एकदम फिट? इन 4 टेस्ट से तुरंत चलेगा पता, जानें कब और किस कंडीशन में किए जाते हैं

 आज की बदलती जीवनशैली और अस्वस्थ खानपान की वजह से दिल की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। उम्र बढ़ने के साथ-साथ दिल की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देना बेहद जरूरी हो गया है। कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. जेरेमी लंदन, जिनके 25 साल से अधिक का क्लिनिकल अनुभव है, ने हाल ही में इंस्टाग्राम पर दिल की सेहत से जुड़े कुछ अहम स्क्रीनिंग टेस्ट के बारे में जानकारी साझा की।

एंकल ब्रेकियल इंडेक्स (ABI)
डॉ. लंदन बताते हैं कि एंकल ब्रेकियल इंडेक्स टेस्ट हाथों और टखनों में ब्लड प्रेशर की तुलना करता है। पैरों में खून का बहाव कम होने का मतलब अक्सर शरीर की दूसरी जगहों पर भी धमनियों में प्लाक जमा होना हो सकता है। कम ABI हार्ट अटैक और स्ट्रोक का बड़ा संकेत हो सकता है, भले ही व्यक्ति में कोई लक्षण दिखाई न दें।

कैरोटिड अल्ट्रासाउंड
कैरोटिड अल्ट्रासाउंड गर्दन की कैरोटिड धमनियों की तस्वीरें बनाता है, जो दिल से दिमाग तक रक्त पहुंचाती हैं। यह टेस्ट प्लाक के कारण होने वाली रुकावटों का पता लगाता है और स्ट्रोक के जोखिम का मूल्यांकन करने में मदद करता है।

इकोकार्डियोग्राम (Echocardiogram)
इकोकार्डियोग्राम, जिसे ‘इको’ भी कहा जाता है, धड़कते दिल की लाइव तस्वीरें दिखाता है। यह टेस्ट बताता है कि दिल कितनी अच्छी तरह रक्त पंप कर रहा है, वाल्व कैसे काम कर रहे हैं और दिल की मांसपेशियों में कोई कमजोरी या मोटापा तो नहीं है।

कार्डियक सीटी एंजियोग्राम (CCTA)
कार्डियक सीटी एंजियोग्राम एक उच्च तकनीकी सीटी स्कैन है जो एक्स-रे और कंप्यूटर का उपयोग करके दिल और कोरोनरी धमनियों की 3D तस्वीरें बनाता है। यह टेस्ट धमनियों में ब्लॉकेज, संकुचन या प्लाक का सटीक पता लगाने में मदद करता है। डॉ. लंदन ने सलाह दी है कि दिल से जुड़े किसी भी टेस्ट को करवाने से पहले व्यक्तिगत डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है। डॉक्टर आपकी उम्र, जीवनशैली और मेडिकल हिस्ट्री को ध्यान में रखकर तय करेंगे कि कौन-सा टेस्ट आपके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।

सावधान! वेट लॉस की दवा कहीं आपके लिए भी न कर दें मुश्किल पैदा, खासकर यह लोग रहें सतर्क

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 दुनिया भर में वजन घटाने के लिए मशहूर 'ओजेम्पिक' इंजेक्शन अब भारत में भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। मूल रूप से टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों के लिए बनाई गई यह दवा आजकल अपनी एक 'साइड इफेक्ट' के कारण सुर्खियों में है और वह है तेजी से वजन कम करना। दिसंबर 2025 में भारत में इसकी उपलब्धता बढ़ने के साथ ही इसके फायदों और खतरों पर बहस तेज हो गई है।

ओजेम्पिक क्या है और यह कैसे काम करती है?

ओजेम्पिक का वैज्ञानिक नाम सेमाग्लूटाइड (Semaglutide) है। यह हमारे शरीर में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले GLP-1 हॉर्मोन की नकल करती है। डॉ. अनिल गोम्बर (सीनियर कंसल्टेंट, यथार्थ सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल) के अनुसार यह दवा शरीर में निम्नलिखित बदलाव लाती है। यह दिमाग को संकेत देती है कि आपका पेट भरा हुआ है। यह पेट के खाली होने की प्रक्रिया को धीमा कर देती है जिससे आप लंबे समय तक तृप्त महसूस करते हैं। यह इंसुलिन के उत्पादन को बढ़ाती है और ग्लूकागॉन (जो शुगर बढ़ाता है) को कम करती है।

कीमत और परिणाम: क्या यह पैसा वसूल है?

मीडिया रिपोर्ट्स और बाजार के आंकड़ों के अनुसार भारत में इस इंजेक्शन का मासिक खर्च 10,000 से 20,000 रुपये के बीच आता है। एक साल में व्यक्ति का वजन 15% तक कम हो सकता है। शोध बताते हैं कि दवा छोड़ने के कुछ ही समय बाद घटा हुआ दो-तिहाई वजन वापस लौट आता है। इसे हफ्ते में केवल एक बार लगाना होता है।

गंभीर खतरे और साइड इफेक्ट्स

जितनी यह दवा असरदार है उतने ही इसके जोखिम भी डराने वाले हैं। 2025 की लेटेस्ट स्टडीज के अनुसार:

  1. पैनक्रियाटाइटिस: पैंक्रियास में सूजन का खतरा 146% तक बढ़ सकता है।

  2. दृष्टि हानि (NAION): आंखों की एक दुर्लभ बीमारी का जोखिम बढ़ता है जिससे रोशनी जा सकती है।

  3. थायरॉइड ट्यूमर: जानवरों पर हुए परीक्षण में थायरॉइड कैंसर के लक्षण देखे गए हैं।

  4. गैस्ट्रोपेरेसिस: पेट की मांसपेशियां इतनी कमजोर हो सकती हैं कि भोजन पचना मुश्किल हो जाता है।

किन लोगों को इस इंजेक्शन से दूर रहना चाहिए?

यदि आप वजन घटाने के लिए इसे आजमाना चाहते हैं तो सुनिश्चित करें कि आप इन श्रेणियों में न आते हों:

  • जिन्हें पहले कभी पैनक्रियाटाइटिस रहा हो।

  • जिनके परिवार में थायरॉइड कैंसर का इतिहास (Family History) हो।

  • किडनी या लिवर की गंभीर बीमारी वाले मरीज।

  • गर्भवती महिलाएं या स्तनपान कराने वाली माताएं।

क्या हैं इसके फायदे? (डॉक्टर की सलाह पर)

अगर डॉक्टर की देखरेख में इसका सही इस्तेमाल किया जाए तो यह टाइप-2 डायबिटीज को नियंत्रित करने, हृदय रोगों (Heart Disease) के खतरे को कम करने और मोटापे से लड़ने में मदद कर सकती है। कुछ अध्ययनों में इसे अल्जाइमर जैसी भूलने की बीमारी में भी मददगार पाया गया है।

सावधान! जीभ साफ करने की ये आदत आपको दे सकती है खतरनाक इंफेक्शन, न करें इसे नज़रअंदाज़

सावधान! जीभ साफ करने की ये आदत आपको दे सकती है खतरनाक इंफेक्शन, न करें इसे नज़रअंदाज़

 Tongue Clean Risk : आजकल सोशल मीडिया पर टंग स्क्रैपिंग यानी जीभ साफ करना एक बड़ा हेल्थ ट्रेंड बन गया है। इन्फ्लुएंसर्स और वीडियो में दावा किया जाता है कि जीभ पर जमी सफेद परत को खुरचकर हटाने से सांसों की बदबू (Bad Breath) तुरंत खत्म हो जाती है और मुंह फ्रेश हो जाता है लेकिन डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने इस पर एक बड़ी चेतावनी जारी की है। क्या आप जानते हैं कि आपकी यह छोटी सी आदत आपके दिल (Heart) को खतरे में डाल सकती है?

कैसे काम करता है टंग स्क्रैपर और क्या है जोखिम?

टंग स्क्रैपर का इस्तेमाल जीभ की सतह पर जमा बैक्टीरिया, मृत कोशिकाओं और खाने के कणों को निकालने के लिए किया जाता है। कई लोग इसे टूथब्रश से ज्यादा प्रभावी मानते हैं। जब आप मेटल या प्लास्टिक के स्क्रैपर से जोर लगाकर जीभ साफ करते हैं तो जीभ की नाजुक त्वचा पर बेहद बारीक कट लग सकते हैं। ये कट इतने छोटे होते हैं कि नग्न आंखों से दिखाई भी नहीं देते। इन सूक्ष्म घावों के जरिए मुंह के खतरनाक बैक्टीरिया सीधे आपके रक्त प्रवाह (Bloodstream) में प्रवेश कर जाते हैं।

टंग स्क्रैपिंग और दिल का इंफेक्शन: एंडोकार्डाइटिस (Endocarditis)

'पबमेड सेंट्रल' (PubMed Central) में छपी एक रिसर्च के अनुसार जीभ के जरिए खून में पहुंचे बैक्टीरिया दिल के वाल्व और उसकी अंदरूनी परत तक पहुंच सकते हैं। इससे एंडोकार्डाइटिस नामक जानलेवा बीमारी हो सकती है।

    1. मृत्यु दर: विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी में मृत्यु दर 15% से 30% तक हो सकती है।

    2. किसे है ज्यादा खतरा? जिन लोगों को पहले से हार्ट की बीमारी है जिनका हार्ट वाल्व बदला गया है जिन्हें पेसमेकर लगा है या जिनकी इम्यूनिटी कमजोर है उनके लिए टंग स्क्रैपिंग बहुत जोखिम भरी हो सकती है।

      क्या है एंडोकार्डाइटिस? यह दिल के वाल्व में होने वाला एक गंभीर संक्रमण है।

    एंडोकार्डाइटिस के मुख्य लक्षण

    अगर जीभ साफ करने की आदत के बाद आपको ये लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें:

    • लगातार हल्का बुखार और कमजोरी महसूस होना।

    • सांस फूलना या दिल की धड़कन का अनियमित होना।

    • पैरों, हाथों या पेट में अचानक सूजन आना।

    • अचानक वजन कम होना।

    डॉक्टरों की सलाह: सुरक्षित तरीका क्या है?

    दंत चिकित्सकों (Dentists) के अनुसार मुंह की सफाई के लिए ट्रेंड के पीछे भागने के बजाय सुरक्षित तरीके अपनाएं:

    • सॉफ्ट ब्रश का इस्तेमाल: जीभ को खुरचने के बजाय नरम बालों वाले टूथब्रश से हल्के हाथों से साफ करें। यह उतना ही असरदार और कहीं ज्यादा सुरक्षित है।

    • सफाई का सही तरीका: दिन में दो बार ब्रश करें और फ्लॉस (Floss) करना न भूलें।

    • जड़ तक जाएं: अगर सांसों की बदबू लगातार बनी हुई है तो यह केवल जीभ की गंदगी नहीं बल्कि पेट की खराबी, मसूड़ों की बीमारी या कैविटी का संकेत हो सकता है

Potato Adulteration: आपकी रसोई में आलू के तौर पर ‘जहर’ तो नहीं मौजूद? घर पर 1 मिनट में ऐसे करें पहचान

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 आज के इस दौर में मार्केट में हर कई चीज़ें मिलावटी मिल रही हैं। इन मिलावटी चीज़ों के सेवन से शरीर को कई तरह से नुक्सान होता है। मार्केट में मौजूद मिलाटवखोरों को इससे कोई मतलब नहीं। ऐसे में सर्दियों का सीजन शुरू होते ही बाजार में 'नए आलू' की मांग बढ़ जाती है, लेकिन इसी मांग का फायदा उठाकर मिलावटखोर आपकी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। मुनाफे के लालच में विक्रेता पुराने कोल्ड स्टोरेज वाले आलुओं को अमोनिया और सिंथेटिक रंगों से ट्रीट करके 'नया आलू' बनाकर बेच रहे हैं। यह प्रक्रिया न केवल धोखाधड़ी है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक भी है। विशेषज्ञों के अनुसार इन रसायनों के संपर्क में आने से सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन और त्वचा संबंधी गंभीर रोग हो सकते हैं। इस मिलावट के पीछे का मुख्य कारण पुराने स्टॉक को ऊंचे दामों पर निकालना और उपज को कृत्रिम रूप से चमकदार बनाना है

ऐसे बनाते हैं  पुराने आलू को नया

मिलावटखोर पुराने आलू का कायाकल्प करने के लिए एक पूरी प्रक्रिया अपनाते हैं। सबसे पहले पुराने आलुओं को अमोनिया के घोल में कई घंटों तक डुबोकर रखा जाता है। इससे आलू का सख्त छिलका मुलायम और पतला हो जाता है। इसके बाद  इसे घोल से निकालकर गीली मिट्टी में रगड़ा जाता है, जिससे ऊपरी छिलका उतर जाता है और आलू बिल्कुल ताजे 'नए आलू' जैसा दिखने लगता है। कई बार इनका रंग निखारने के लिए हानिकारक सिंथेटिक रंगों का भी प्रयोग किया जाता है।

केमिकल वाले आलू की पहचान कैसे करें?

बाजार से आलू खरीदते समय आप इन आसान तरीकों से मिलावट पकड़ सकते हैं:

  • असामान्य चमक: अगर आलू जरूरत से ज्यादा चमकदार और उसकी सतह एकदम चिकनी दिख रही है, तो समझ जाएं कि इसमें केमिकल का इस्तेमाल हुआ है। प्राकृतिक नए आलू की सतह साधारण और सफेद होती है।
  • छिलके की परत: नया आलू खुरचने पर छिलका निकलता है, लेकिन अगर छिलका पूरी परत के रूप में आसानी से उतर रहा है, तो वह अमोनिया से ट्रीट किया गया पुराना आलू है।
  • अजीब गंध: आलू को सूंघकर देखें; यदि उसमें मिट्टी के बजाय किसी तीखी या रासायनिक दवा जैसी महक आ रही है, तो उसे खरीदने से बचें।
  • काटने पर अंतर: नया आलू काटने पर सूखा और कड़ा होता है, जबकि केमिकल युक्त पुराना आलू काटने पर अंदर से पानी या रस छोड़ता है।
  • पानी का परीक्षण: आलू को पानी में भिगोकर देखें। यदि मिट्टी के साथ पानी का रंग बदलने लगे, तो समझ लें कि इसे सिंथेटिक रंगों से रंगा गया है।

 

सर्दियों में कम प्यास लगना शरीर के लिए है खतरे की घंटी, किडनी और लिवर पर होता है सीधा असर

सर्दियों में कम प्यास लगना शरीर के लिए है खतरे की घंटी, किडनी और लिवर पर होता है सीधा असर

 सर्दियों के मौसम में तापमान गिरते ही लोगों को प्यास कम लगने लगती है। ठंड की वजह से पसीना कम आता है और इसी कारण अधिकतर लोग पूरे दिन में एक या दो गिलास पानी पीकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि प्यास न लगने के बावजूद शरीर को सर्दियों में भी पर्याप्त मात्रा में पानी की उतनी ही जरूरत होती है, जितनी गर्मियों में। पानी की कमी शरीर के कई अंगों पर नकारात्मक असर डाल सकती है, खासकर किडनी और लिवर पर इसका प्रभाव गंभीर हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एक वयस्क व्यक्ति को दिनभर में कम से कम 2.5 से 3 लीटर पानी जरूर पीना चाहिए। अगर ठंड के मौसम में सादा पानी पीने में परेशानी होती है, तो गुनगुना पानी एक बेहतर विकल्प हो सकता है। इसके अलावा नारियल पानी, ताजे फलों के रस, सब्जियों के जूस और घर पर बने सूप के जरिए भी शरीर में पानी की कमी को पूरा किया जा सकता है।

कम पानी पीने से किडनी की सेहत पर खतरा
किडनी को शरीर की सफाई करने वाली मशीन माना जाता है। इसका मुख्य काम खून को साफ करना और शरीर में जमा गंदगी को यूरिन के जरिए बाहर निकालना होता है। जब व्यक्ति पर्याप्त पानी नहीं पीता, तो किडनी को इस गंदगी को बाहर निकालने में दिक्कत होती है। इससे किडनी में पथरी बनने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही यूरिन इंफेक्शन, पेशाब में जलन जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। अगर लंबे समय तक पानी की कमी बनी रहे, तो किडनी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है और उसका कामकाज प्रभावित हो सकता है।

लिवर के लिए बढ़ जाती है परेशानी
पानी की कमी का असर लिवर पर भी साफ तौर पर दिखाई देता है। लिवर का मुख्य काम शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालना और भोजन को पचाने में मदद करना होता है। इन दोनों प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त पानी जरूरी है। जब शरीर में पानी की कमी हो जाती है, तो विषैले तत्व लिवर में जमा होने लगते हैं। इससे लिवर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और उसकी कार्यक्षमता धीमी हो जाती है।

पानी कम पीने से खून गाढ़ा होने लगता है, जिससे लिवर को अपना काम करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। इस स्थिति में लिवर में सूजन की समस्या हो सकती है और शरीर में थकान व ऊर्जा की कमी महसूस होने लगती है।

पेट की समस्या और कब्ज की शिकायत
सर्दियों के मौसम में खानपान में भी बदलाव आ जाता है। लोग अक्सर तला-भुना और भारी भोजन ज्यादा मात्रा में खाने लगते हैं। ऐसे भोजन को पचाने के लिए पर्याप्त पानी बेहद जरूरी होता है। अगर पानी कम पिया जाए, तो पाचन क्रिया प्रभावित होती है और पेट ठीक से साफ नहीं हो पाता। इसका नतीजा कब्ज, गैस और पेट में भारीपन के रूप में सामने आता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को परेशान कर सकता है।

विशेषज्ञों की मानें तो सर्दियों में भी नियमित अंतराल पर पानी पीने की आदत डालना बेहद जरूरी है। भले ही प्यास न लगे, लेकिन शरीर की अंदरूनी सफाई और अंगों के सही कामकाज के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना सेहतमंद रहने की सबसे जरूरी शर्त है।

भारत में लॉन्च हुई ओजेम्पिक की दवा, अब आसानी से घटा सकेंगे वजन, जानें कितनी होगी कीमत

भारत में लॉन्च हुई ओजेम्पिक की दवा, अब आसानी से घटा सकेंगे वजन, जानें कितनी होगी कीमत

 दुनियाभर में लोकप्रिय डायबिटीज की दवा ओजेम्पिक अब भारत में भी उपलब्ध हो गई है। नोवो नॉर्डिस्क ने इसे भारत में लॉन्च कर दिया है। यह दवा शुगर कंट्रोल करने के साथ-साथ वजन घटाने में भी मददगार मानी जा रही है। इस दवा के माध्यम से डायबिटीज रोगियों और मोटापे से परेशान लोगों को इलाज में नया विकल्प मिलेगा।

ओजेम्पिक में सक्रिय घटक सेमाग्लूटाइड है, जो शरीर में प्राकृतिक रूप से मौजूद GLP-1 हार्मोन की तरह काम करता है। यह हार्मोन भूख को नियंत्रित करता है और शुगर लेवल को संतुलित रखता है। जब व्यक्ति कम भोजन करता है, तो शरीर में कैलोरी की खपत भी कम हो जाती है, जिससे वजन कम होने में मदद मिलती है। इस दवा का यह असर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो डायबिटीज के साथ-साथ वजन कम करने की प्रक्रिया में हैं।

भारत में कीमत और डोज
0.25 एमजी हफ्ते की डोज: ₹2,200

0.5 एमजी हफ्ते की डोज: ₹2,540

1 एमजी हफ्ते की डोज: ₹2,800

ओजेम्पिक की डोज मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, मोटापे और डायबिटीज के प्रकार के अनुसार डॉक्टर तय करते हैं। यदि कोई व्यक्ति एक महीने या छह महीने तक दवा का सेवन करता है, तो डोज की कुल कीमत भी उसी के अनुसार बढ़ती है।

सावधानियां और चेतावनी
दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में मेडिसिन विभाग के डॉ. अजीत कुमार ने बताया कि ओजेम्पिक का भारत में लॉन्च होना अच्छी खबर है, लेकिन इसे किसी भी व्यक्ति को बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेना चाहिए। यह जरूरी नहीं कि दवा सभी व्यक्तियों पर समान रूप से असर करेगी। इसके कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। उन लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए जिनके पेट की गंभीर बीमारियां हैं या जिनका शुगर लेवल अत्यधिक बढ़ा हुआ है। दवा लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श आवश्यक है।

डॉ. कुमार ने स्पष्ट किया कि ओजेम्पिक का इस्तेमाल केवल मेडिकल सलाह के तहत ही किया जाना चाहिए। सही डोज और चिकित्सकीय निगरानी के साथ इस दवा का सेवन करना सुरक्षित रहेगा। ओजेम्पिक अब भारत में डायबिटीज और वजन नियंत्रण के लिए एक नया विकल्प बन गया है। यह दवा शुगर लेवल को नियंत्रित करने के साथ-साथ भूख को कम करके वजन घटाने में मदद करती है। हालांकि, इसका सेवन डॉक्टर की देखरेख में ही किया जाना चाहिए, ताकि संभावित दुष्प्रभावों से बचा जा सके।

HEALTH : रात में स्वेटर पहनकर सोना सेहत के लिए नुकसानदेह? जानिए एक्सपर्ट की चेतावनी

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 HEALTH NEWS:  सर्दियों में ठंड से बचने के लिए कई लोग रात में भी स्वेटर या बहुत गर्म कपड़े पहनकर सो जाते हैं, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक यह आदत सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है, क्योंकि इससे शरीर का तापमान जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है और नींद की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है।

डॉक्टर बताते हैं कि सोते समय शरीर खुद को ठंडा करता है ताकि गहरी और सुकूनभरी नींद आ सके, लेकिन स्वेटर पहनने से बेचैनी, बार-बार नींद टूटना, ज्यादा पसीना आना, डिहाइड्रेशन, त्वचा पर रैशेज, खुजली, घमौरियां और ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं।

HEALTH : किचन के 7 देसी मसाले जो खराब कोलेस्ट्रॉल को प्राकृतिक रूप से कम कर सकते हैं

HEALTH : किचन के 7 देसी मसाले जो खराब कोलेस्ट्रॉल को प्राकृतिक रूप से कम कर सकते हैं

 HEALTH NEWS: खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा तेजी से बढ़ जाता है, लेकिन एक्सपर्ट्स बताते हैं कि किचन में मौजूद कुछ आम मसाले इसे प्राकृतिक रूप से कम करने में मदद कर सकते हैं। कोलेस्ट्रॉल एक चिप-चिपा फैटी पदार्थ है, जिसमें LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाए तो धमनियां ब्लॉक होकर हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।

डॉक्टर की सलाह के साथ कुछ देसी नुस्खे अपनाने से LDL कम और HDL यानी अच्छा कोलेस्ट्रॉल बढ़ाया जा सकता है। अदरक ब्लड प्रेशर और खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में प्रभावी है, रिसर्च में पाया गया कि यह ट्राइग्लिसराइड्स और LDL को घटाकर HDL बढ़ा सकता है। मेथी दाना में मौजूद सैपोनिन्स LDL के अवशोषण को कम करते हैं और रोज सुबह भिगोकर खाने से फायदा मिलता है।

लहसुन में मौजूद एलिसिन खून में जमा फैट को घोलकर धमनियों को साफ करता है, खाली पेट 2 कच्ची कलियां असर दिखाती हैं। हल्दी में कर्क्यूमिन सूजन कम करके ब्लड वेसल्स को स्वस्थ रखता है जिससे कोलेस्ट्रॉल जमना कम होता है, इसे दूध में या कच्ची हल्दी के रूप में लिया जा सकता है। दालचीनी ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल दोनों को नियंत्रित करती है, आधा चम्मच पाउडर गुनगुने पानी के साथ लेना फायदेमंद माना जाता है।

बदलते मौसम में गले की खराश–खांसी से तुरंत राहत! जानें 3 घरेलू नुस्खे, एक देता है अगले दिन ही आराम

बदलते मौसम में गले की खराश–खांसी से तुरंत राहत! जानें 3 घरेलू नुस्खे, एक देता है अगले दिन ही आराम

 नई दिल्ली। बदलते मौसम में बच्चों से लेकर बड़ों तक गले की समस्या आम हो गई है। सूखी खांसी, खराश और गले में जलन लोगों को दिनभर परेशान करती है। ऐसे में घरेलू नुस्खे बेहद असरदार माने जाते हैं। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों का कहना है कि सही तरीके से अपनाए गए नुस्खे सिर्फ एक दिन में राहत दे सकते हैं — खासकर शहद और सेंधा नमक वाला घरेलू उपचार।

1. शहद और सेंधा नमक — अगले दिन ही राहत देने वाला नुस्खा

यह नुस्खा प्रसिद्ध आयुर्वेदिक डॉक्टर सुभाष गोयल ने सुझाया है।

  • 1 चम्मच शहद में ½ चम्मच सेंधा नमक मिलाएँ।

  • मिश्रण को उंगली से चाटें और गले पर हल्की मालिश होने दें।

  • इसके बाद गर्म पानी या ब्लैक टी पिएँ (दूध और चीनी न डालें)।

डॉक्टर का दावा:
“इस नुस्खे से गले की खराश और सूखी खांसी में अगले दिन ही आराम मिल जाता है।”

2. अदरक रस + तुलसी रस + शहद — तीन गुना असरदार फॉर्मूला

यह पेस्ट गले की सूजन, कफ और जलन को तेजी से ठीक करता है।

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  • ¼ चम्मच अदरक रस

  • ¼ चम्मच तुलसी रस

  • ¼ चम्मच शहद
    इन्हें मिलाकर पेस्ट बनाएँ और सेवन करें।
    अदरक में एंटी–इंफ्लेमेटरी गुण, तुलसी में इम्यूनिटी बूस्टर और शहद में एंटी–बैक्टीरियल तत्व मिलकर गला तुरंत शांत करते हैं।

3. तुलसी–काली मिर्च की चाय — सूखी खांसी का आसान इलाज

यह चाय बदलते मौसम में बेहद असरदार मानी जाती है।

  • 1 ग्लास पानी

  • 5–6 तुलसी पत्ते

  • थोड़ी काली मिर्च
    इसे अच्छी तरह उबालें और छानकर स्वाद अनुसार शहद मिलाएँ।
    नियमित सेवन से सूखी खांसी में तेजी से राहत मिलती है।

डॉ. कहते हैं—
“बदलते मौसम में अगर दवाइयों से राहत नहीं मिल रही है तो ये घरेलू नुस्खे बेहद प्रभावी हैं। नियमित रूप से इन्हें अपनाने से गले की ज्यादातर समस्याएँ ठीक हो जाती हैं।”

 
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